गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

 पुस्तक चर्चा 

खींचो न कमानों को

 

संपादकीयम, समकाल से मुठभेड़, सवाल और सरोकार, लोकतंत्र के घाट पर,  कोरोना काल की डायरी के बाद समसामयिक ज्वलंत मुद्दों पर अपनी विशेष चर्चा के साथ प्रो.ऋषभदेव शर्मा की नव्यतम कृति ‘खींचो न कमानों को’ वर्ष 2022 के प्रवेश के साथ पुस्तकप्रेमियों के लिए उपलब्ध है| हैदराबाद के प्रतिष्ठित अखबार हिंदी मिलाप में 6 सितंबर 2021 से 20 जनवरी 2022 तक प्रकाशित कुछ विशिष्ट संपादकीय टिप्पणियों का संग्रह है- ‘खींचो न कमानों को|’ निहितार्थ स्पष्ट है कि जब गुत्थियाँ बुद्धि से सुलझाई जा सकती है तो फिर तलवारें म्यान में ही रहें तो बेहतर है| एक जमाना था जब अखबार केवल जन की आवाज होती थी| आज दौर बिक्री और खरीद-फरोख्त का है, मुखौटों का है इसमें कौन खरा और कौन कच्चा?

समीक्ष्य कृति में कुल 7 खंड हैं| इन सात खंडों में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े कुल 70 टिप्पणियाँ हैं जिन्हें बहुत खूबसूरती के साथ वर्गीकृत कर उनका नामकरण किया गया है| उपलब्ध या रचित सामग्री का उचित वर्गीकरण और योग्य नामकरण करने की कला को विद्वजन भी साहित्यिक संस्कार मानते हैं| प्रो. शर्मा की कृतियों में इसकी आकर्षक और उचित उपस्थिति हमेशा ही रहती है| कृति खींचो न कमानों को का वर्गीकरण और नामकरण देखें- ‘पहला खंड है काहे को दुनिया बनाई!| इसमें 22 टिप्पणियाँ हैं| दूसरा खंड है शतरंज के खिलाड़ी| इसमें 16 टिप्पणियाँ हैं| तीसरा खंड है हमारा समाज जिसमें 10 टिप्पणियाँ हैं| चौथा खंड किसान आंदोलन में तीन टिप्पणियाँ है| पाँचवाँ खंड हरित विमर्श में भी तीन टिप्पणियाँ हैं| छठा खंड शांति की प्रतीक्षा में 7 टिप्पणियाँ हैं| सातवाँ और अंतिम खंड है विविध सरोकार जिसमें 9 टिप्पणियाँ हैं|’

समाज का हालेदिल बयान करने की अपनी बेमुरब्बत चाह के साथ ही व्यंग्य की धारदार टिप्पणी देने से लेखक कतराते नहीं हैं| जैसे अफगानिस्तान पर तालिबानियों के कब्जे के बाबत लेखक का यह लिखना कि इसमें कोई दोराय नहीं कि गणराज्य के इस युग में तालिबान का राज ‘गन’ राज्य है! बंदूक की नोंक पर तालिबानी अपनी मनमानी न सिर्फ अफगानिस्तान पर कर सकते हैं या करते रहे हैं बल्कि भारत जैसे अन्य देश भी जो उसकी मित्र सूची के बाहर हैं वे गंभीर खतरे की रडार की रेंज में हैं| गंभीर और उलझे हुए मसलों पर बड़ी सुलझी हुई टिप्पणी यहाँ देखने को मिल जाती है| जैसे क्वाड (चतुर्भुज समूह) की शिखर बैठक को ही लिया जाए| अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत और जापान – इन चार देशों के इस समूह का दायित्व हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त रखने के लिए हुआ है| ये चारों देश चीन से त्रस्त हैं| इसका कारण भले ही राजनैतिक, आर्थिक या जगह हड़पने की नीति से संबद्ध हो| प्रो.शर्मा के अनुसार चूँकि चीन ने इन सबको अपनी हरकतों से त्रस्त कर रखा है इसलिए यह स्वाभाविक है कि वह इन्हें अपना विरोधी समझे| पाकिस्तान की ओर रुझान के बावत रूस द्वारा भारत पर बनाया गया दबाव निहायत ही रूस की गैर जिम्मेदाराना हरकत है| “कहना न होगा कि रूस का यह आचरण उदारवादी अर्थव्यवस्था वाले ग्लोबल समाज की रीति-नीति के मान्य सिद्धांतों के खिलाफ है|” (17/09/2021)  ऐसे बेखटके टिप्पणी कर देना उसके ही बूते की बात हो सकती है जो लंबे समय से बदलती स्थितियों का जायजा लेता रहा हो|  तालिबान राज में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से निर्वासित करने की नीति पर निशाना साधती हुई टिप्पणी का शीर्षक है- ‘तालिबान की स्त्री-द्रोही नैतिकता’ | इसी प्रकार दुनिया में सभी देशों के साथ बदलते समीकरणों और उससे उत्पन्न प्रभाव की चर्चा करने के साथ ही भारत की निहायत ही घरेलू चर्चाओं को अपने संपादकीय में लेखक ने स्थान दिया है| राजनीतिक दांव-पेंच, लखीमपुर खीरी की हिंसा, राज्यों से लेकर अड्डों तक के नाम बदलने की नीति के साथ कांग्रेस पार्टी की  माली हालत पर भी निशाना साधा है, देखें- “उन्होंने कृषि कानूनों, लखीमपुर खीरी की घटना, अर्थव्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने को लेकर भाजपा सरकार की आलोचना तो की, लेकिन इस प्रश्न से खुद को बचा लिया कि उनकी पार्टी इन सब समस्यायों के बीच सार्थक और सटीक विपक्ष की भूमिका में खरी क्यों नहीं उतर पा रही है!”(20/10/2021)

हिंदुत्व के मुद्दे पर सलमान खुर्शीद की अवांछित बहस, केजरीवाल की चुनावी रणनीति का एक हथकंडा मुफ्तवाद तथा विभिन्न चुनावी समीकरणों पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने न्याय व्यवस्था  की दशा का बयान भी किया है जो इस प्रकार है- “जब लोग पिछले अनुभवों से यह जान जाते हैं कि उनकी निगाह में गंभीर अपराध की घटनाएँ भी लंबे समय तक लंबित और अनिर्णीत पड़ी रहती हैं, सरकारें और अदालतें कोई फैसला करती नजर नहीं आतीं; तो वे खुद फैसले पर उतारू हो जाते हैं! यह कानून के डर का खत्म होना नहीं, बल्कि व्यवस्था की न्याय क्षमता के प्रति चरम अविश्वास का प्रतीक है| इसलिए जनता और उसकी आस्था को दोषी ठहराने से पहले उसे इस आपराधिक कृत्य के लिए प्रेरित करने वाले तत्वों की भी निशानदेही होनी चाहिए|” (22/12/2021) यह पंजाब में हुई बेअदबी की घटनाओं के संदर्भ से संबंधित है| युवक की बेअदबी का जवाब भीड़ ने उसकी हत्या से दिया| यह अनुचित था| बे-चेहरा भीड़ का यह जंगल न्याय समाज में अपनी जड़ें क्यों पसार रहा है? प्रो. शर्मा इसके दो कारण बताते हैं- एक धार्मिक आतंकवाद और दूसरा राज्य की निरीह कानून व्यवस्था| यदि इन स्थितियों से निपटा नहीं गया तो समाज में अराजकता का बोलबाला होगा, अमन का नहीं|

जन्मदिन, मंदिर और जुर्माना शीर्षक टिप्पणी के अंतर्गत आप देख सकते हैं कि समाज में जातिप्रथा और छुआछूत का भाव आज भी कई स्थानों पर अपने चरम पर है| दलितों का आज भी मंदिर में प्रवेश वर्जित है| यह स्थिति बहुत विडंबनापूर्ण कही जा सकती है कि एक उच्च अधिकारी या संपत्तिवान व्यक्ति का सम्मान बिना उसकी जात पूछे; सभी करते हैं पर अधनंगा, भूखा, मलिन, फटेहाल व्यक्ति भले ही ब्राह्मण क्यों न हो; सम्मानित कम ही होते होंगे! आजाद भारत में केवल छुआछूत ही नहीं, ‘बाल-विवाह, बच्चों के साथ ऑनलाइन दुर्व्यवहार, बाल श्रम, बाल तस्करी, लिंग आधारित हिंसा के मामलों में कोरोना काल में निरंतर वृद्धि हुई है|’ (06/10/2021) ये तथ्य एनसीआरबी तथा क्राई द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर लेखक द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं| इसी प्रकार सूत्रों के अनुसार भारत में भूख और भुखमरी की समस्या में भी वृद्धि आई है | एक रिपोर्ट के अनुसार “भारत में कोविड-19 की वजह से लगाए गए प्रतिबंधों ने आम लोगों की जिंदगी को बुरी तरह से प्रभावित किया है, जहाँ दुनिया भर में ‘बच्चों की बर्बादी’ की दर सबसे ज्यादा है|” (18/10/2021) आज पूरा भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है| क्या अमृत महोत्सव जब अपने नौनिहालों के कंठ में एक निवाले का उपाय नहीं! विकास हो रहे हैं पर जितना विकास हुआ है उससे कई गुणा होना अभी बाकी है! असली भारत की तस्वीर दूर-दराज के इलाकों में आज भी दिखाई देती है! सुविधाओं से रहित उस भारत की चौखट पर शायद कभी चुनावी रौनक जाती हो!

बारिश से बेहाल उत्तराखंड, किसान जीवन और संबंधित नीतियों एवं प्रकरण, जलवायु हितैषी जीवन शैली, आतंक, जम्मू कश्मीर से जुड़ी रणनीति, स्त्री द्वेष के मंच इत्यादि विषयों पर अपनी टिप्पणी देते हुए घरेलू भाषा से शक्ति की भाषा...शीर्षक के तहत हिंदी के पक्ष में लेखक का तर्क है कि हिंदी केवल घरेलू भाषा और मातृभाषा ही नहीं, विविध मातृभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोक्ता भाषा-समाजों की संपर्क भाषा, जन भाषा और राष्ट्रभाषा अर्थात भारतीय अस्मिता की प्रतीक अक्षेत्रीय भाषा भी है| संविधान में उसका राष्ट्रभाषा के रूप में उल्लेख न किया जाना और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उसे अव्यक्त रहने देना ‘राजनैतिक चतुराई’ के सुंदर नमूने हैं!

कृति के शीर्षक ‘खींचों न कमानों को’ की तथता बनाए रखते हुए लेखक ने कई पोलों और घालमेलों को परत-दर-परत उघाड़ने की जो चेष्टा की है उसके जरिए एक सजग पत्रकार  से मुलाक़ात होती है| 

समीक्षित कृति: खींचो न कमानों को

लेखक: ऋषभदेव शर्मा

प्रकाशन: श्री साहिती प्रकाशन, हैदराबाद

संस्करण: प्रथम, 2022

पृष्ठ: 148

 समीक्षक : डॉ. चंदन कुमारी  (वर्ष 2022 )

 

 

 

पुस्तक चर्चा 

लोकतंत्र के घाट पर...

डॉ. चंदन कुमारी


loktantr ke ghat par coverसमय बीतता जाता है। भविष्य के कालखंड में अब के बीते हुए समय की प्रवृत्ति और प्रकृति को यदि कोई अनुसंधित्सु जानना-समझना चाहेगा, तो वह अतीत के पन्नों में अंकित अक्षरों को ढूँढेगा। पन्ने जिनमें समय के सत्य का प्रामाणिक और तटस्थ अंकन हो। पन्ने जिनमें समय की सरगर्मी, दिलेरी, बेबसी, आत्मीयता और उड़ान का अंकन हो। पन्ने जिनमें समय की मार खाए मनुज के आँसू को मोती में तब्दील कर अपनी माला में पिरोने की ताक में बैठे अवसरवादियों का भी अंकन हो। ऐसे ही कुछ पन्नों पर अपने समय के सत्य को प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘लोकतंत्र के घाट पर’ में अंकित किया है।

प्रो. ऋषभ देव शर्मा हैदराबाद से प्रकाशित एक दैनिक पत्र का संपादकीय निरंतर लिख रहे हैं। भारत की चतुर्दिक परिस्थितियों पर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने सजग लेखन से वे पहले ही हिंदी भाषा और साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान तथा साहित्यकार के रूप में विशेष ख्याति अर्जित कर चुके हैं। समीक्ष्य पुस्तक में चुनावी रणनीति पर गंभीर विमर्श मौजूद है। राजनीति की दुरूहता और जटिलता को रेशा-रेशा कर एक सामान्य मनुष्य के लिए उसे सुगम्य बनाते हुए उसकी भेड़-चाल को स्पष्ट करने की सफल कोशिश यहाँ दिखाई देती है। कुल 81 संपादकीय इस संग्रह में संकलित हैं। 

देश और दुनिया की पीड़ा की जड़ों को पहचानकर उसे तथ्यपरक और तर्कसंगत ढंग से इस पुस्तक के जरिये पुनः सामने रखा गया है। जन से सरोकार रखनेवाले विचारयोग्य तथ्यों पर विचार की अनिवार्यता बताते हुए कई महत्वपूर्ण संकेत यहाँ दिए गए हैं। उनमें से कुछ बिंदुओं का उल्लेख निम्नलिखित है-

  • संयुक्त राष्ट्र के अनुसार रोहिंग्या मुसलमान दुनिया के सबसे उत्पीड़ित अल्पसंख्यक समूहों में से एक है। पता नहीं क्यों किसी भी मुस्लिम राष्ट्र का इस्लामिक ब्रदरहुड का जज्बा इन लाचार भाइयों के लिए कभी जोर नहीं मारता? दूसरी ओर भारत का उच्चतम न्यायालय अवैध और अवांछित होने पर भी इन्हें बाहर धकेलने की इजाजत नहीं देता। 05.06.2018

  • यदि नीति आयोग और भारत सरकार को यह लगता है कि 2024 से लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना राष्ट्रीय हित में होगा, तो इसपर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है। कहीं खर्च घटाने के चक्कर में निरंकुश शासन की राह आसान नहीं कर देंगे। ग्रासरूट लेवल के मुद्दे महत्वहीन हो जाएँगे। 12.06.2018

  • लोकतंत्र में असमहमति और संवाद के लिए हमेशा जगह रहनी चाहिए। अतिवादी गतिविधियाँ काले धन के बल पर ही चलती हैं। भारत विरोधी ताकतों से प्राप्त फंड अपनी जगह तो हैं ही। सैनिक कार्रवाई के साथ ये सारे रास्ते बंद होने चाहिए। 23.06.2018

  • बेहतर हो कि महिला-महिला चीखकर छाती पीटने के बजाय सारे राजनैतिक दल व्यावहारिक स्तर पर उनका समर्थक होना सिद्ध करें। इसके लिए उन्हें बस इतना करना होगा कि अगले आम चुनाव में 33% सीटों पर केवल महिलाओं को टिकट देकर अपनी नेकनीयती दर्शाएँ। 18.07.2018

  • शांतिपूर्ण ढंग से असहमति या विरोध प्रकट करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है जिसके लिए उसे उचित स्थान मिलना ही चाहिए। 31.07.2018

  • राजनीति के अपराधीकरण के कैंसर का तुरंत और प्रभावी इलाज अति आवश्यक है। मार्च 2018 के आंकड़ों के अनुसार 4896 विधायकों में से 1765 के खिलाफ कुल 3065 आपराधिक मामले दर्ज हैं। 27.09.2018

  • किसानों की आय दुगुनी कब होगी? अन्ना हजारे से लेकर अखिल भारतीय किसान सभा, किसान मुक्ति संसद और तमिलनाडु के किसानों तक को बार-बार दिल्ली दरवाजे पर दस्तक देने के लिए मजबूर होना पड़ता है। 03.10.2018

  • निचले तबके के लोगों को अपराधी और अशिष्ट मानने की सामंती और साम्राज्यवादी (बल्कि, विलायती) मानसिकता आखिर कब जाएगी? 09.10.2018

  • अनिवार्य वोटिंग की तुलना में एक बेहतर विकल्प यह भी हो सकता है कि जैसे कुछ देशों में ‘जूरी ड्यूटी’ होती है तथा सब नागरिकों को कभी-न-कभी ‘जूरी’ पर होना ही होता है, वैसे ही विधायक और सांसद नियुक्त होने चाहिए। इससे राजनीति को व्यवसाय बनानेवाले हतोत्साहित होंगे। 23.11.2018

  • जीवन बीमा, फसल बीमा, चिकित्सा बीमा, फसलों की तुरंत खरीद और तुरंत भुगतान की गारंटी कर्ज माफ़ी की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकते हैं। 26.12.2018

  • युद्ध जैसी आपात स्थिति में सेनाओं के साथ ही एकजुटता का ही नहीं बल्कि देश के राजनीतिक नेतृत्व के साथ भी सच्चे मन से एकजुटता का प्रदर्शन करने की जरूरत है तभी भारत विरोधी ताकतों तक यह संदेश जा सकता है कि देश की सुरक्षा का सवाल भारतीय जनता की तरह राजनीतिक दलों के लिए भी राजनीति से ऊपर की चीज है। 01.03.2019

इसके अतिरिक्त इन्होंने खासी-पंजाबी संघर्ष पर चर्चा के माध्यम से बताया है गया है कि सोशल मीडिया खतरनाक भी हो सकता है। ‘कश्मीर ग्लिम्पसेज ऑफ़ हिस्ट्री एंड स्टोरी ऑफ़ स्ट्रगल’ पुस्तक में पेश की गई लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को खलनायक बनानेवाली छवि की थ्योरी का उल्लेख करते हुए उसका खंडन समीक्ष्य पुस्तक में किया गया है। लेखक ने किशोर कुणाल की पुस्तक ‘अयोध्या रिविजिटेड’ से संदर्भ लेते हुए बताया है, “बाबरी मस्जिद बाबर ने नहीं बनवाई थी। बाबर कभी अयोध्या नहीं गया। जो शिलालेख मस्जिद पर लगे थे वे फर्जी हैं। 1858 से पहले यहाँ नमाज और पूजा दोनों अदा की जाती थी।” अब तो राम मंदिर का शिलान्यास भी हो गया। तीन तलाक, महिला आरक्षण, नोटबंदी, शराबबंदी, शबरीमलै सहित विविध मुद्दों पर लेखक की बेबाक टिपण्णी अपनी भाषिक विलक्षणता के कार्न विशेष रुचिकर प्रतीत होती है। इन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि शहादत, धर्म, जाति, गोत्र, संप्रदाय और सैन्य अभियान को चुनावी मुद्दों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। ‘गरीबी, अशिक्षा, नागरिक सुविधाओं का अभाव और ढाँचागत क्षेत्रों में गतिहीनता’ चुनाव के वास्तविक मुद्दे हैं। “कश्मीरियत सियासत से बहुत ऊपर है”- पुलवामा केंद्रित इस संपादकीय के जरिए शाश्वत मानवता के स्वरूप की व्याख्या की गई है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फ़ौज की मदद से सबसे पहले पोर्ट ब्लेयर की सरजमीं पर तिरंगा फहराया था। विश्वविजेता अंग्रेज जाति की नाक में दम करने का जीवट रखने वाले अपराजेय पौरुष के प्रतीक स्वरूप नेताजी और स्वाधीनता संघर्ष में उनके अविस्मरणीय योगदान की याद स्वतः स्तुत्य है। पुस्तक में राष्ट्रीयता, एकता और स्थानीयता का स्वर बुलंद है। चुनावी नारों का विश्लेषण रोचक है। गाँधी चरित्र के प्रकाश में लेखक का कहना है कि जरूरत है प्रतीक से आगे बढ़कर उन प्रश्नों से टकराने की जिनसे यह देश रूबरू है। इसे एक गंभीर अंतःदर्शी वाक्य मानकर केवल सराहना कर देना समय की मांग नहीं है। इस अंतःदर्शिता को कार्यान्वित करना समय की मौलिक जरूरत है। अनुपस्थित वोट, गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी और न्यूनतम आय जैसे विषय भी यहाँ उपस्थित हैं। पुस्तक प्रासंगिक है। 

समीक्षित पुस्तक : लोकतंत्र के घाट पर 

लेखक : ऋषभदेव शर्मा 

संस्करण : 2020 (किंडल/ ऑनलाइन)

समीक्षक : डॉ. चंदन कुमारी

हिंदी विभाग, भवन्स श्री ए के दोशी महिला कॉलेज जामनगर-361008 (गुजरात) 

         आवासः द्वारा श्री संजीव कुमार, आईएफए , एयर फ़ोर्स स्टेशन, जामनगर-361003 (गुजरात) 

 मोबाइलः 8210915046, ई-मेलःchandan82hindi@gmail.com,

वर्तमान पता : Q.No-E2, Regional Training Centre, EM Block, Salt Lake, Sector V, Kolkata -700091  




 

पुस्तक चर्चा

 

                                   वर्तमान का आईना : ‘संपादकीयम्’


‘संपादकीयम्’(2019) ऋषभदेव शर्मा के चुनिंदा संपादकीयों का संग्रह है। ये संपादकीय नियमित रूप से हैदराबाद के एक दैनिक अख़बार में प्रकाशित होते रहे हैं और यह क्रम अब भी जारी है। डॉ. योगेंद्रनाथ मिश्र (गुजरात) उनके शब्द चयन के कायल हैं तो रवि श्रीवास्तव (हैदराबाद) उनकी पक्षकारिता-मुक्त पत्रकारिता के। डॉ. रामनिवास साहू का मानना है कि यह सब लिखने के लिए साहस चाहिए। सत्ता और व्यवस्था को उसका वास्तविक चेहरा दिखाने के लिए साहस तो चाहिए। वर्तमान को उसका चेहरा दिखाने वाली इस पुस्तक में कुल आठ खंड है जो विविध समसामयिक विषयों पर केंद्रित है। प्रो. गोपाल शर्मा ने इसे ‘भव’ साधना माना है जो अनायास ही सध गई।

पहला खंड ‘स्त्री संदर्भ’ है। इक्कीसवीं सदी में जब माना जा रहा है कि हर स्त्री सशक्त और सक्षम है – यह पुस्तक उस घोषित सच का आवरण हटाकर, समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति दिखाती है। स्त्री समाज के लिए सामाजिक वातावरण की असहजता का हिसाब बताती है। आंकड़ों के हिसाब से लेखक ने बताया है कि ग्लोबल एक्सपर्ट सर्वे में यह पाया गया कि भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश है। महिलाओं से गुलाम जैसा व्यवहार करने और यौन हिंसा में यह देश ‘नंबर वन’ है तथा स्त्री अधिकारों की हत्या करने में इसने अफगानिस्तान व सीरिया जैसे युद्धग्रस्त देशों को भी पीछे छोड़ दिया है। वैसे लेखक का मानना है कि इस रिपोर्ट में कुछ अतिरंजना भी हो सकती है। युद्ध और संघर्ष में यौन हिंसा की भुक्तभोगी नादिया जिसका संबंध यजीदी समुदाय से है, उस यौन दासी की आपबीती एक किताब ‘द लास्ट गर्ल : माइ स्टोरी ऑफ़ कैप्टिविटी एंड माइ फाइट अगेंस्ट द इस्लामिक स्टेट’ (2017) के रूप में सामने आई। खुद को उस नारकीय जीवन से मुक्त करने के बाद नादिया ने यौन हिंसा के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया। उनके इस अभियान के लिए उन्हें और यौन हिंसा की शिकार स्त्रियों की चिकित्सा के लिए समर्पित डेनिस मुक्वेगो (स्त्री रोग विशेषज्ञ, कांगो) को 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। संघर्षशील नादिया की जिजीविषा सबके लिए प्रेरणा है।

जरा सी बात पर मायूसियत ओढ़ने की फितरत जीते जी अपनी कब्र खोदना है। हर फ़िक्र से दूर एक जूनून कुछ कर गुजरने का होना ही चाहिए। शबरीमाला मंदिर में 10–50वर्ष की महिला के प्रवेश पर रोक को लेखक ने लोकद्रोह की संज्ञा देते हुए, इसे लोक और भक्त के अधिकार से जोड़ा है। इस प्रतिबंध को समाप्त करने के न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। स्त्री का वस्तुकरण रोकते हुए न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिनका जिक्र इस पुस्तक में है। भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक मानते हुए ख़ारिज किया गया क्योंकि स्त्री की सहमति और असहमति से कोई सरोकार न रखनेवाली इस धारा में स्त्री को पुरुष की संपत्ति माना गया था। इसके साथ ही अब विवाहेतर संबंध या व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया गया है। ‘एक साथ तीन तलाक’ दंडनीय अपराध माना गया है। साथ ही स्त्री-खतना प्रथा को खत्म किया गया है। कानूनन स्त्री की इच्छा को तवज्जो दिए जाने के बावजूद देश में स्त्रियों के लिए भयमुक्त वातावरण नहीं बन पाया है और इस सच का भयावह चेहरा ‘मी टू’ के माध्यम से बहुत बार सामने आया। संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि स्त्री के लिए घर सबसे खतरनाक जगह है। न सिर्फ गाँव, घर और शहर बल्कि बड़े से बड़े सफेदपोश स्थल भी स्त्री-शोषक के किरदार में फिट बैठते हैं। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं की कुल हत्या के मामले में 40 से 50 प्रतिशत तक दहेज़ हत्या के मामले होते हैं। इन तथ्यों का जिक्र करते हुए लेखक पुरुष वर्चस्व वाले समाज में पुरुष आयोग की सिफारिश को यह कहते हुए ख़ारिज करते हैं कि “पुरुष को किस उत्पीड़न का भय? उत्पीड़न की स्थिति में न्यायालय तो है।”

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में 30 छात्राओं की पिटाई का जो मामला सामने आया वह भी इसमें शामिल है। अश्लीलता का विरोध न करने की नसीहत विद्यालय में दी गई। उसे न मानते हुए जब छात्राओं ने अपने विवेक की सुनी और विरोध किया तो क्या पाया? उनकी दुर्गति करनेवालों में तीन महिलाओं का शामिल होना विडंबना ही तो है! सच को सच और झूठ को झूठ बताना गुनाह बन गया! ये अपनी दुनिया के सारे समीकरण कैसे उलट-पुलट होरहे हैं! डर और दर्द से सबकी मुक्ति की दास्तान है ‘‘संपादकीयम्’’!

‘लोकतंत्र और राजनीति’ दूसरा खंड है| इसमें 'राजनीति की भाषा में बढती अशिष्टता', 'जाति और गोत्र की वेदी पर लोकतंत्र', 'मतदाता की उदासीनता का अर्थ', 'उपेक्षित लद्दाख का दर्द', 'रिश्ता वोट का शराब से', 'विरोध भी समर्थन भी'– जैसे आलेखों में चुनावी मौसम का मिज़ाज मापते हुए लोकतंत्र और राजनीति की वास्तविक स्थिति को उघाड़ा गया है।

तीसरा खंड ‘जो उपजाता अन्न’ किसान की दुर्दशा पर केंद्रित है। किसान की आत्महत्याओं का हल निकलना चाहिए। हमने आत्महत्या की, आपने कर्ज माफ़ कर दिया; बस हो गया। इस व्यवस्था/ तंत्र से किसान को ‘कर्ज की जरूरत की परिस्थिति’ से मुक्ति चाहिए ।चौथे खंड ‘शहर में दावानल’ में ‘लोकतंत्र को कलंकित करता भीड़ न्याय’, ‘अब किसके पिता की बारी है’ जैसे आलेख हैं। 

पाँचवाँ खंड ‘व्यवस्था का सच’ में ‘इंतजाम की पोल खोलती पहली बारिश’, ‘ये मौत की सड़कें’, अपने काम के प्रति हमारी ईमानदारी पर प्रश्न चिह्न हैं। छठा खंड ‘हमारी बेड़ियाँ’ है। इस खंड में शामिल कुछ आलेख हैं - ‘प्रणय की हत्या प्रतिष्ठा के नाम पर’, ‘तुम्हारी जाति क्या है डॉक्टर’, ‘तो शब्दकोश में नहीं रहेगा दलित’, ‘आधुनिक गुलामी और हम’ इत्यादि। सभी आलेखों का इशारा उन बेड़ियों की तरफ है जिनमें हमने जबरन खुद को जकड़ कर अपनी जिन्दगी को जटिल बना रखा है। उन्मुक्त हवा में बोझिल मन से दुरूहता जीने की हमारी स्व-अर्जित बेबसी की ओर महज ध्यान खींचना लेखक का उद्देश्य नहीं रहा होगा। व्यवस्था बदलनी चाहिए और इसे जीने वाले ही इसे बदल सकते हैं।

सातवाँ खंड ‘अस्तित्व के सवाल’ हैं। इसमें इंसान का ही नहीं, पर्यावरण का अस्तित्व भी शामिल है। ग्लोबल वार्मिंग से समुद्र का जल स्तर निरंतर बढ़ रहा है। यह तटीय इलाकों के लिए विशेष चिंताजनक है। पर्यावरण संरक्षण के साथ बच्चों की असुरक्षा, भुखमरी और असहाय बुढ़ापा से संबंधित आलेख भी इस खंड में हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट 2018 के अनुसार जिन 44 देशों को भूख के मामले में गंभीर स्थिति वाला माना गया है उनमें भारत भी एक है। भारत के झारखंड राज्य में 50% से अधिक परिवारों को जरूरत के मुताबिक खाना नहीं मिलता है। 4% लोग एक वक्त के अपर्याप्त खाने पर असंतोष करते हैं।

अंतिम खंड ‘वैश्विक संदर्भ’ में दुर्गा पूजा में विदेशी रुचि का अर्थ समझाते हुए लेखक का मानना है, “धार्मिक-सांस्कृतिक मेलजोल का फायदा उठाकर वे भारतीयों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाना चाहते हैं। सारी कवायद वाणिज्य के वास्ते है; संस्कृति तो बहाना है।” इसके अतिरिक्त युद्ध का विकल्प शांति, विश्व व्यापार संगठन नीति, ‘आतंक बनाम सभ्य रिश्तों का पाखंड’ जैसे आलेख भी हैं जिनमें मानवीय सभ्यता और संस्कृति को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने की कोशिश नजर आती है। इंसानों ने धरती और समुद्र नाप लिया,अब आसमान नापने की तैयारी में व्यस्त हैं। अंतरिक्ष पर कब्जा ज़माने की मंशा को भांपते हुए लेखक के भीतर का तेवरीकार कहता है :

“हिंसा की दूकान खोलकर, बैठे ऊँचे देश।

आशंका से दबी हवाएँ, आतंकित परिवेश। ।

गर्म हवाओं के पंखों पर, लदा हुआ बारूद;

खुसरो कैसे घर जाएगा, रैन हुई चहुँ देस।।”

इस प्रकार यह पुस्तक एक ओर तो लेखक के व्यापक सरोकारों का पता देती है तथा दूसरी ओर किसी भी प्रकार की नारेबाजी और फतवेबाजी से परे रहकर पाठक को अपने समय और समाज से जुड़े सवालों से रूबरू कराते हुए उन पर सोचने के लिए विवश करती है। निष्कर्षत:  ढेर सारी विविधतापूर्ण और पौष्टिक बौद्धिक खुराक देने वाली यह पुस्तक ध्यान से पढ़ने और विचारने योग्य है।

समीक्षित कृति : संपादकीयम् (लेख/ पत्रकारिता)/ लेखक- ऋषभदेव शर्मा/ आईएसबीएन: 97893-84068-790/

प्रकाशक- परिलेख, नजीबाबाद/ वितरक- श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद : मोबाइल +91 98499 86346

 

( समीक्षा तिथि : 9 अप्रैल 2019)

शनिवार, 23 नवंबर 2024

 

रामकथा सुंदर करतारी : RAM KATHA SUNDAR KARTARI (Hindi Edition) किंडल संस्करण


अनुक्रम

को रघुबीर सरिस संसारा
खंड 1: सीय राममय सब जग जानी
  1. श्रीराम वंशावली
  2. रघुनाथ का शील
  3. प्रीति पुरातन लखई न कोई
खंड 2 : रामकथा : संस्कृति और जीवन दर्शन
4. राम का तात्विक स्वरूप
5. आलवार संत कवियों की रचनाओं में राम
6. कृष्णभक्त कवियों की रचनाओं में रामकथा
7. वर्ण धर्म और भक्ति
8. रामचरितमानस में आदिवासी समाज
9. यातें पहिचानत हैं भूषन जे पाँय के
10.आस्था, आत्मोत्सर्ग और भाव संबंध
11. भारतीय संस्कृति के सूत्र
12. पर्यावरण चेतना
13. राम भक्ति के आलोक में दशानन चरित
14.नहुष चरित : जीवन का उत्थान-पतन
खंड 3: भगति तात अनुपम सुखमूला

15. सकल लोक जग पावनि गंगा
16. प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू
17. दुर्वासा धाम
18. सुनहु राम अब कहउँ निकेता
19. सो मम भगति भगत सुखदाई
20. सरनागत कहुँ जे तजहिं
21. जाके प्रिय न राम बैदेही
22. मानस रोग और निदान
23. अनुकरणीय व्यक्तित्व : तुलसीदास
खंड 4 : मंगल भवन अमंगल हारी

24. एक श्लोकी रामायण
25. अहल्या कृत श्रीराम स्तुति
26. परशुराम कृत श्रीराम स्तुति
27. अत्रि मुनि कृत श्रीराम स्तुति
28. सुतीक्ष्ण मुनि कृत श्रीराम स्तुति
29. जटायु कृत श्रीराम स्तुति
30. ब्रह्मा कृत श्रीराम स्तुति
31. इंद्र कृत श्रीराम स्तुति
32. त्रिपुरारि शिव कृत विनती स्वरूप श्रीराम स्तुति
33. वेद कृत श्रीराम स्तुति
34.शिव कृत श्रीराम स्तुति
श्रीराम विश्वपालक हैं अपने जग-मंगलकारी और लोकरक्षक स्वरूप में, वे भक्तवत्सल और निर्वैर हैं चराचर जगत पर अपने प्रेम रूपी मेघ की छाया करने वाले श्रीराम अपने अंशों के साथ देह धारण करके दशरथ और कौसल्या की गोद में, उनके आँगन में तरह-तरह से शिशुलीला करते हैं पढ़ने योग्य आयु होने पर वे भाइयों समेत गुरुकुल जाकर विद्याध्ययन करते हैं राजकुमार अपने राजसी वैभव और ठाठ को एकदम भूलकर गुरुकुल में अन्य शिष्यों की भाँति ही आश्रम के सभी कामों में अपनी सहभागिता देते हैं प्राचीन भारतीय गुरुकुल परंपरा के अंतर्गत गुरु अपने शिष्य को शास्त्र और शस्त्र विद्या का ज्ञान देने के साथ ही वे उन्हें जीवन जीने की कला और परिश्रम की महत्ता भी बताते थे यह गुरु द्वारा बोलकर नहीं सिखाया जाता था वरन शिष्यों द्वारा आश्रम के विभिन्न कार्यों में उनकी अपनी सहभागिता के द्वारा उन्हें स्वयं ही ज्ञात हो जाता था इस प्रकार उनमें कर्त्तव्य बोध और साहचर्य का भाव जागृत होता था
विद्या के आगार राम ने अपने इस मनुज अवतार में दिव्य शक्तियों और विद्याओं का अर्जन किया मारीच-सुबाहु-ताड़का के आतंक से त्रस्त ऋषि-मुनियों के उद्धार की कामना लेकर; महाराज दशरथ से उनके प्रिय राम-लक्ष्मण को माँगकर, महर्षि विश्वामित्र जब अयोध्या से चले तब राम के आचरण व गुणों से प्रभावित होकर, उन्होंने जान लिया कि ये कोई साधारण किशोर नहीं हैं उन्होंने अपने ईश को पहचान लिया और तब उन्होंने उन्हें कई दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए इन सभी को महर्षि विश्वामित्र ने अपने तपोबल से सिद्ध किया था श्रीराम को सुपात्र जानकर ही उन्होंने अपने दिव्य आयुध सहित दिव्य विद्याओं का ज्ञान भी उन्हें हर्षातिरेक से गदगद होकर प्रदान किया
“तब ऋषि निज नाथहि जिय चीन्ही विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही
जाते लाग न क्षुधा पिपासा अतुलित बल तनु तेज विलासा”
गुरु की कृपा की सुलभता के लिए सहजता और सरलता के साथ लोक हितकारी कर्मों का संपादन आवश्यक होता है धरती पर बहती गंगा, आसमान में उगते सूर्य और चारों दिशाओं में बहती हवा के समान जो लोकहित का साधक बने, जो यज्ञ की समिधा से प्रज्ज्वलित अग्नि के समान पवित्रता धारण करे और धरती के समान बिना गुण-दोष विचारे हर जीव को उनका स्थान देने के साथ आसमान के विस्तार-सी छाया सब पर रख सके निःसंदेह वह राम है अर्थात इन सब गुणों को जो एक साथ अपने आचरण में समाविष्ट कर सके वह श्रीराम हैं