तृतीय
अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मलेन
मानस भवन,
भोपाल के पावन प्रांगण में रामानुरागी सज्जनों की उपस्थिति में दिनांक 22 एवं 23
मार्च 2025 को द्विदिवसीय तृतीय अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का भव्य आयोजन किया
गया| इस आयोजन में देश-विदेश के अनेक विद्वानों ने शिरकत की| इस सम्मेलन में सात
प्रांतों और तीन देशों के विद्वान सम्मिलित हुए| कुल13 सत्रों में 72 शोध पत्रों
का वाचन हुआ| दो दिन, दो कक्ष और समूची गहमागहमी के साथ तल्लीनता श्रीराम के नाम
में|
कार्यक्रम का
शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ| पहले दिन प्रदर्शनी का
उद्घाटन हुआ| इसमें कला विहान क्रिएटिव आर्ट ग्रुप ने रामायण के विविध प्रसंगों पर
आधारित प्रदर्शनी लगाई थी| डाक टिकटों की
भी दुर्लभ प्रदर्शनी लगाईं गई| पुरातत्व विभाग द्वारा श्रीराम की दुर्लभ प्रतिमाओं
का चित्र भी प्रस्तुत किया गया|
श्री शिवकुमार
निगम (त्रिनिदाद टोबेगो) ने रामकथा को सॉफ्ट डिप्लोमेसी ऑफ़ इंडिया कहा| उन्होंने
कहा कि यहाँ की आबादी 13 लाख है, इसमें 43% लोग भारतीय मूल के हैं| उनके अनुसार
विदेशों में रह रहे इंडियन ओरिजिन के लोगों को मोबिलाइज करने के लिए राम संस्कृति
एक टूल है| वेस्टइंडीज कोई एक देश नहीं है| यह कैरेबियन समुद्र में फैले हुए
छोटे-छोटे द्वीपों का समूह है| इसमें से ही एक द्वीप त्रिनिदाद और टोबेगो है|
उनलोगों ने यहाँ एक प्रयोग किया, नाम रखा ‘एपिक हनुमान चैंटिंग’- इसके तहत 21 घंटे
लगातार हनुमान चालीसा का पाठ किया गया| इसमें कुल 16000 लोग शामिल हुए| यहाँ अलग
धर्म के लोग आपस में वैवाहिक संबंध भी बनाते हैं| इनके नाम ‘संगीता हुसैन’, ‘रामदीन
मोहम्मद’ जैसे रखे जाते हैं| यहाँ रामलीला भी प्रचलित है|
श्रीगंगाप्रसाद
शर्मा ‘गुणशेखर’ ने चीन की संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पीली नदी की
सभ्यता, सिंधु नदी की सभ्यता के बहुत करीब है| हनुमान सूर्य को निगल लेते हैं|
चीनी भाषा में इन्हें ‘सर्वकूं’ और राम को ‘लोमो’ कहते हैं| यहाँ श्राद्ध की
परंपरा भी है| सात पीढ़ियों का नाम भी यहाँ प्रचलित है| चीनी रामायण में सीता हरण
का प्रसंग नहीं है| यहाँ अहिंसा की संस्कृति है| स्वर्णमृग वाला प्रसंग भी नहीं है|
यह प्रसंग मलेशिया की रामकथा में है| राम पत्थर मारते हैं| इससे हिरण की आँख फूट
जाती है| चीनी रामायण में यह भी है कि सीता का जन्म उसी राक्षस की भूमि पर हुआ है|
यहाँ अग्निपरीक्षा नहीं ली जाती है| सीता कहती हैं कि राम के प्रति मेरी निष्ठा नहीं
है तो सभी पक्षी मूक हो जाए| तभी सभी पक्षी बोलने लगे| इंसानी भाषा में बोलना शुरू
कर देते हैं| राम की करूणा, स्त्री के प्रति द्रवित होने का भाव है| धार्मिक और
धर्मनिरपेक्ष समाज को जोड़ने का काम रामकथा ने किया है| दशरथ कथानकम में दशरथ की
चार रानियाँ हैं| चौथी रानी से शत्रुघ्न का जन्म होता है| भरत के चरित्र की वही
मान्यता है| हान संस्कृति में 95%हान जाति राममय है|
आगे संगोष्ठी
संयोजक श्री राजेश श्रीवास्तव ने कहा कि ‘इरफ़ान अहमद’ ने चीनी रामायण पर काम किया
है| चीनी ताय रामायण, लंका सिपहो इत्यादि कई रामायण हैं|
श्रीलंका के श्री
बाला सांकुरात्रि (तेलुगु, तमिल, कन्नड़ रामायण के विशेषज्ञ) ने श्रीलंका में राम
से जुड़े स्थानों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहाँ ‘सीतामन’ नामका एक देवस्थान है|
19 मई 2024 को सीतामन स्थित माँ सीता का कुंभाभिषेक हुआ| इसके लिए जल अयोध्या के
सरयू से लाया गया था| वहीँ ‘नोवारा एलिया’ सिटी में एक बड़ा पहाड़ है जिसकी आकृति
हनुमान के मुख के समान है| मानावरी, लंकायाम, शंकरीदेवी, दुतुविला (पूल ऑफ़ ऐरोज),
युदंगनाव (युद्ध का मैदान), त्रिकोणेश्वर (रावण की तपस्या स्थली), मातली (जिला का
नाम), एहंगला (छोटे पर्वत), रुमसला (सुग्रीव की पत्नी के नाम के आधार पर), अनवदुआ
(ऊपर से गिरा हुआ) इत्यादि स्थान श्रीलंका में हैं जो श्रीराम से संबंधित हैं|
वहां के रामायण में उल्लेख है कि संजीवनी पर्वत को दो बार लाया गया| पहली बार इसे
वानर सेना के लिए लाया गया था| दूसरी बार लक्ष्मण के इलाज के बाद इस पर्वत के पाँच
टुकड़े किए गए| उन्होंने बताया कि राम सेतु वर्तमान समय में 16 जगहों पर विजिवल है|
इसमें से आठ जगह भारत में है और आठ श्रीलंका में है|
डॉ. संजय
सक्सेना (वरिष्ठ चिकित्सक) ने स्पष्ट किया कि आठवीं कक्षा तक रामकथा से उनका कोई
परिचय नहीं था| अपने संबोधन में उन्होंने कहा, “रामशलाका के बल पर मैं आज यहाँ तक
पहुँचा हूँ| अपने जीवन के प्रश्नों के हल तो इनसे पूछा ही, परीक्षा के प्रश्नों का
हल भी मैं रामशलाका में ढूंढ लिया करता था|” व्यंग्यकार एवं निराला सृजन पीठ की श्रीमती
साधना बलवटे ने कहा कि अपनी आत्मा को शुद्ध करके राम की भक्ति करें या रामकथा रूपी
मानसरोवर में प्रवेश कर अपनी आत्मा को निर्मल करें| आत्मसम्मान और धैर्य खोए बिना
अँधेरे से उजाले की ओर जाना है| हम्पी में शैव और वैष्णव के मध्य अवस्थित विवाद को
उन्होंने मिथ्या प्रचार कहा| शबरी के चरित्र को स्त्री सशक्तीकरण से जोड़ते हुए कहा
कि अपने विवाह में पशुभोज का विरोध करने हेतु वो घर से भाग कर वन में मतंग मुनि के
आश्रम में आ गई| हाँ मन में पिता को बिना बताए यह कार्य करने का पछतावा रहा|
वेदांती रामायण में भी उल्लेख है कि राम वहां अवतरित होंगे जहाँ चित्त में कोई
युद्ध नहीं हो|
श्री गौरीशंकर
शर्मा ‘गौरीश’, अखिल भारतीय कला मंदिर के अध्यक्ष ने कहा कि रामकी उपासना करनी
चाहिए या उनका चरित समझना चाहिए| किसी के हो जाओ या किसी को अपना बना लो|
विश्वामित्र के चरित्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्र को बचाना
है तो चारो भाई की तरह छात्रों को तैयार करना होगा| अंतिम समय में राम को ब्रह्म
के रूप में याद करें| 108 दोहों में मैंने रामायण लिखा है| उसके कुछ दोहों को आप
सुनिए-
“मैं कामी
लोलुप अंधकूप की शान,
मायापति दे दो मोहि ज्ञान|”
“पतित अपावन
पातकी नीचकर्म के अंग|
चंचल मन मत
वासना, ना जानूं सत्संग||”
तुलसी
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. मोहन तिवारी ने संगोष्ठी में पढ़े गए शोध पत्रों की
विस्तृत समीक्षा की| वैशाली गवली ने आयुर्वेदीय महत्व पर प्रकाश डाला| “गुरूजी
फाटत धरती समायब हो अयोध्या न जायब हो”- के गायन से पूरी सभा लोकरंग में भींज गई| श्री
दयाराम मंडल ने भारत के डाक टिकटों के माध्यम से राम वनगमन पथ पर प्रकाश डाला|
अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर तमसा मंडाय गौरा-घाट, हंपी नदी के तट पर स्थित
सीताकुंड, प्रतापगढ़, शृंग्वेरपुर, सीता पहाड़ी इत्यादि की भी चर्चा की| कैलाशचंद
केसरी ने रामचरितमानस में ब्रह्माण्ड दर्शन पर चर्चा की| नीतू दुबे ने मानस में
भक्ति के विविध स्वरूप पर बात की| रामशंकर भारती ने कहा कि अंत समय में बौद्ध
भिक्षु भी ‘राम नाम सत्य है सब बोलो मुक्त है’ का उच्चारण करते हैं| शव स्नान के
बाद वक्षस्थल पर राम लिखते हैं| यह है समाज में राम की व्याप्ति| कोरोनाकाल में
किसी गरीब के घर भोजन बांटने जाने पर उसका जवाब था कि बाबूजी हम तो उपासे हैं, आज रामनवमी
है|
दूसरे दिन
सत्र आठ और दस ‘कक्ष दो’ में चला और ‘कक्ष एक’ में अकादमिक सत्र सात और नौ का
आयोजन हुआ| इस दौरान जवाहर कर्णावट को भी सुनने का अवसर मिला| श्री विजित प्रताप
सिंह ने कंबन रामायण और रामचरितमानस में भिन्नता को बतलाया| एक दक्षिणा प्रसंग
कंबन रामायण में है| लंका विजय से पहले राम यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहते हैं|
उन्हें एक ब्राह्मण चाहिए जो शैव और वैष्णव दोनों है| जामवंत रावण के पास जाते हैं|
यज्ञ के बाद रावण दक्षिणा में यह माँगता है कि जब मैं मृत्युशय्या पर रहूँ तो मेरा
यजमान (राम) मेरे पास रहे| सीताहरण का प्रसंग भी यहाँ अलग है| भूतल से एक हाथ नीचे
योजन कुटी खोदकर कुटी सहित सीता को ले जाते हैं|
डॉ. विजया शर्मा
अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना ने कहा कि आध्यात्मिकता होनी चाहिए| आध्यात्मिकता को
अपने चरित्र में जीना चाहिए| मेरे लिए नृत्य पूजा है और मैं अपने नृत्य में
अध्यात्म को जीती हूँ| मैं जहाँ भी कार्यक्रम के लिए जाती हूँ, वहां कोई ऐसा स्थान
होता है जिसके दर्शन के लिए परमात्मा ने मुझे चुना है| ऐसा मुझे लगता है| श्री ओ.पी.श्रीवास्तव
(मध्यप्रदेश गृहसचिव के पद से सेवामुक्त) ने ‘शब्द मानस’ की रचना की है| इन्होंने
रामत्व और राजत्व की चर्चा की| रावण पुरोहित भी बनता है और आशीर्वाद भी देता है| श्री
प्रभुदयाल मिश्र ने दसवीं सदी के कर्नाटक की चर्चा की| दंडी ने कहा, “सर्व शुक्ला
सरस्वती”, यह सुनकर विज्जिका नाराज हो गई और उन्होंने कहा, “नीलोत्पलदल शुभ्राम|”
उन्होंने कहा कि वेद, रामायण और महाभारत में सारा ज्ञान-विज्ञान समाहित है| डॉ. शुचि
गुप्ता (मेरठ) इंडोलोजिस्ट हैं| 2016-17 में इंडिक स्टडी के लिए इनका टोरंटो जाना
हुआ| वहां ये 176 प्रमाण लेकर गईं जिसमें से 100 प्रमाण को नकार दिया गया| आज
रामायण की प्रमाणिकता को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं है|
श्री रमणजोगी
जी महाराज (विद्यासाधक) ने कहा प्रभु के बारे में बोलने के लिए प्रभु स्वयं बुलाते
हैं| मैं भी राम हूँ, आप भी राम हैं| विश्वामित्र, वशिष्ठ और परशुराम का तपोबल
श्रेष्ठ है| व्यक्ति दो तरह से वृद्ध होता है| एक ज्ञान से और दूसरा तपोबल से|
ज्ञान वृद्ध की श्रेणी में प्लंबर, कारपेंटर, कलक्टर सभी आ जाएँगे| तपोबल वृद्ध की
श्रेणी में संत श्रेणी की आयु नहीं देखी जाती, उनका तपोबल देखा जाता है| लार्ड
मेकाले की ज्ञान परंपरा के स्थान पर भारतीय शिक्षा प्रणाली पर उन्होंने बल दिया|
स्पष्ट कहा कि हमें अपने आगे वाली पीढ़ी को तैयार करना है कि हमें ही तैयार होते
रहना है| आनेवाली पीढ़ी मिल जाए तो वह संकट को समझ लेगी और समाधान भी खोज लेगी|
गंगा जीवन की सारथी है| जिस स्थान पर बैठे हो उसे राजा राम का स्थान बनाने की
कोशिश करें| गृहसचिव ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि प्रकृति के पीछे एक चैतन्य
सत्ता है जो इसको जीवन देती है| चिंतन के माध्यम से इन्फोर्मेशन मिलता है| अभी
क्वांटम फिजिक्स जो कण तक जा रहा है वह प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली में पहले से
विद्यमान है|
ठेठ सनातनी,
जीवट वाले जुझारू विधायक, तुलसी मानस प्रतिष्ठान के कार्याध्यक्ष श्री रघुनंदन
शर्मा ने कहा कि समुद्र सी गहराई और आकाश की ऊँचाई तक राम के बारे में कहा जा सकता
है| ॐ का उच्चारण और वेद का पठन-पाठन यह भारतीय संस्कृति का अंग है| रामायण को तो
लोग दो-चार पंक्तियों में समेट लेते हैं-
“एक था राम,
एक था रावण ,
वा ने वा की
नार हरी,
वा ने वा को
मारन्ना,
हो गई रामायन्ना|”
विश्व
संस्कृति में राम पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में जो कैस्पियन
सागर है, वह पहले कश्यप ऋषि की तपस्या स्थली था| मैक्सिको में एक स्थान की खुदाई
में 3500 वर्ष प्राचीन गणेश जी की मूर्ति मिली| सब एडीशनल इंजिनियर श्री सुनील कुमार
व्यास देश-विदेश (भारत, स्वीडन, जापान, आस्ट्रिया) में राजा रविवर्मा की पेंटिंग
जो माचिस की डिब्बियों पर छपे हैं, उनकी 154 प्रदर्शनी लगा चुके हैं| इनका नाम तीन
बार लिमका बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है|
श्री
देवेन्द्र कुमार रावत (संपादक तुलसी मानस भारती) ने कहा कि मानस की चौपाइयाँ मंत्र हैं| तुलसी
मानस प्रतिष्ठान का यह मंच रामकिंकरजी का मंच है| यह सत्यमित्रानंद, दिव्यानंद और
राजेश्वरानंद जी का मंच है| यहाँ हनुमान जी प्रथम शोधार्थी के रूप में सामने आए
हैं|
द्वितीय दिवस
के अंत में विशिष्ट अतिथि श्री रामेश्वर जी शर्मा के ओजस्वी वक्तव्य ने श्रोताओं
को बाँध रखा था| ‘गिरिजा संत समागम सम लाभ न कछु आन’ वाले भाव से हनुमान के चरित्र
पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि बचे हुए हनुमान ही सब पर भारी हैं| इन्होंने
ही त्रिलोकीनाथ के गुणगान में सबसे अधिक योगदान निभाया है| ‘राम’ हनुमान की
मुलाक़ात से पहले और ‘राम’ हनुमान के मिलन के बाद – मिलन के बाद एक व्यक्ति राष्ट्र
नायक बनता है या राष्ट्र का सेवक बनता है| बाली,सुग्रीव और हनुमान वही थे पर जब वे
राम के दास नहीं थे तब सूरत अलग थी और जब सेवक बने तब अलग|
उक्त
कार्यक्रम में मंगलायन (शोधपत्र स्मारिका), रामायणदर्शनम (द्वितीय संस्करण, डॉ.
राजेश श्रीवास्तव), अवधी लोकगीतों में सीताराम (डॉ. अंशुबाला मिश्रा), गौमूत्र
महौषधि (श्री प्रह्लाद मंगल), नर्मदा पुराणं (आचार्य पं. गिरिमोहन गुरु) एवं
कानपुर की रामलीला (डॉ. चंदन कुमारी) इत्यादि पुस्तकों का लोकार्पण किया गया|
सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत कथक नृत्य (शिव स्तुति-सुश्री भार्गवी शर्मा,
रामायण-विजया शर्मा), ओडिसी नृत्य (सीताहरण-डॉ. सोनिया मानेश्वर), होली लोकनृत्य (डॉ.
अर्चना यादव) के अतिरिक्त वायलिन जुगलबंदी (श्री महेश मलिक एवं सहयोगी), बाँसुरी
वादन (श्री जितेंद्र बंसल) एवं भजन गायन (श्रीमती जयश्री सवांगु)भी हुआ|
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