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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

सुनो तो सही


सुनो तो सही



ज्ञानतत्व और स्नेहभरित मन की संयुक्त अभिव्यक्ति डॉ. पूर्णिमा शर्मा (1965) प्रतिष्ठित समीक्षक, लेखिका और कवयित्री होने के साथ-साथ हैदराबाद स्थित “हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच”  नामक साहित्यिक संस्था की माननीय उपाध्यक्ष हैं | इन्होने मासिक स्तंभ ‘प्रसंगवश’ का कई वर्ष तक प्रकाशन किया है | समीक्ष्य काव्य संग्रह “सुनो तो सही (2017)” इनकी सद्यःप्रकाशित रचना है जिसका किंडल संस्करण अमेजन पर पठन-पाठन एवं प्राप्ति हेतु उपलब्ध है |

इनकी विद्वता का उल्लेख वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् प्रो.सियाराम तिवारी ने अपने आलेख “हैदराबाद जैसा मैंने देखा” में किया है | ‘परम पुनीता, गुरुमाता डॉ. पूर्णिमा शर्मा को सादर समर्पित’ यह समर्पण वाक्य डॉ. अनुपमा तिवारी ने अपने सद्यः प्रकाशित पीएचडी शोध ग्रन्थ ‘मेहरुन्निसा परवेज की कहानियाँ : सामाजिक यथार्थ और कथाभाषा’ में लिखा है | मन को अभिभूत कर देने वाला यह संबोधन गुरुकुल परंपरा की याद दिलाता है और शीश स्वतः श्रद्धा और आदर के वशीभूत होकर नत हो जाता है |  

समीक्ष्य काव्य संग्रह “सुनो तो सही” में कुल 22 कविताएँ हैं जो जन और जीवन के नब्ज को टटोलने के क्रम में सहसा ही यथार्थ को उघाड़ने का उद्यम कर जाती हैं | अपने इस स्वाभाविक प्रयास में कवयित्री के शब्द युगहित में आवश्यक परिवर्तन की ओर इशारा करते हुए हृदय की भीतरी तह को छूकर, आँखों में सफलता के बाद का थिरता जल और बृहत्तर परिवर्तन की चाह से जुड़ी आशा की मीठी मुस्कान लाने वाले बन गए हैं | द्रष्टव्य है परिवर्तन-कामी स्त्रियों की दृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा निर्णीत एक परिवर्तन, कवयित्री के शब्दों में –

“और तय कर लिया है –
लेकर रहेंगी अपने हिस्से का आकाश ;
भरेंगी ऊँची उड़ान ,
नापेंगी सातों समंदर
और साबित करेंगी 
हम सिर्फ आँगन लीपने
और
झोलों में बंद करने की चीज नहीं हैं
हम बेटियाँ हैं ! हम स्त्रियाँ हैं !!”  (बेटियाँ हैं हम, पृ.30)

सशक्त और मुस्कुराती स्त्री की अंतरात्मा की न दिखाई देनेवाली कलप को भी कवयित्री ने पूरे मनोयोग से न सिर्फ उकेरा है वरन जमीनी विकल्प भी दिया है | आधुनिक समाज में विचारों और भावनाओं का यह उत्तर पक्ष ही है कि अपने वजूद को भूलकर और अपने जड़ों से कटकर जीने की नसीहत देने की पूर्ववर्ती परंपरा से अलग हटकर माँ के रूप में स्त्री अपनी सशक्तता जताते हुए कहती है –
“मैं खड़ी हूँ – अपनी बेटी के साथ;
मैं उसका कल हूँ;
और मैं खुद को जलाने की इजाजत नहीं दूँगी !!” (बेटी की विदाई,  पृ. 28)
यह सशक्तता हर जगह या तो सधती नहीं या फिर वातावरण पर हावी हो जाती है दूषित मानसिकता,  तभी भ्रूणहत्या-सा जघन्य अपराध समाज में निरंतर आश्रय पाए हुए है | अपनी मृत्यु की प्रक्रिया के हर चरण को देखती अवाक् अजन्मी बच्चियों का अपनी माँ से किया जाने वाला यह प्रश्न यहाँ द्रष्टव्य है –

“जन्म से पहले क्यों पढ़े जा रहे हैं मृत्यु के मंत्र ?
क्यों मिलाया जा रहा है तुम्हारे गर्भजल में जानलेवा जहर ?” (गर्भ प्रश्न, पृ.22)

भ्रूणहत्या सहित कई ऐसे मुद्दों को कवयित्री ने उठाया है जो ज्वलंत होने के साथ-साथ मर्मस्पर्शी भी हैं और हृदयविदारक भी | इसी क्रम में प्रस्तुत है भारत से निर्यात की जानेवाली मूंगफली को छीलती भारतीय मजदूर औरतों का एक शब्दचित्र द्रष्टव्य है –
“और छिल जाते हैं उनके होंठ
इस तरह कि –
जुड़ नहीं पाते
एक प्याली चाय पीने की खातिर भी कभी !” (मूंगफली के दाने, पृ.6)

सियासती विद्वेष से उत्पन्न रूह कंपा देने वाली परिस्थिति (प्रजा का हालचाल, पृ.7), सहनशील धरती को रुलाते आदमी की विकास यात्रा के उल्टे कदम (धरती रोती है पृ.13-14), दंगे और दहशत के माहौल में परिवारजनों का सशंकित - भयभीत मन और सारी भयावहता के बीच बचते-बचाते घर लौटी महिला की मनःस्थितियों के चित्रण के साथ ही इस संग्रह की कविताएँ कहीं पीढ़ी अंतराल के जरिए गणतंत्र दिवस के बदलते मायनों से जूझती नजर आती हैं  तो कहीं आत्मीयता के खोल में छिपी दरिंदगी की लगातार जीत से झेंपे हुए मुँह बाए इंसानों से सामना करा जाती हैं | इस प्रक्रम में सामने आता है न्याय व्यवस्था के नैयायिक निर्णय का सच | समीक्ष्य काव्य संग्रह की ‘स्त्री हूँ’, ‘वक्त की बिल्ली’, ‘छाया सीता’, ‘जय हिंद’, ‘मन’ और ‘प्रार्थना’ शीर्षक कविताएँ भी अपने आप में विशिष्ट हैं | साहित्य और समाज के सामयिक यथार्थ को परिलक्षित करती ‘यह समय’ शीर्षक एक त्रिपदी भी इस संग्रह में शामिल  है |

 ‘वसंत आ गया’ शीर्षक कविता में जहाँ महानगरीय जीवन में प्राकृतिक सामीप्य के घोर अभाव की अरुचिपूर्ण स्थिति में कवयित्री द्वारा मुट्ठी भर वसंत को अपने गाँवों की अमराई से भर लाने की चाहत अभिव्यक्त हो रही है वहीँ एक अन्य कविता में वे वर्तमान प्रगतिशीलता की दिशाहीन आपाधापी के बीच ‘प्यार का पथ’ खोजने को उद्दत हैं, द्रष्टव्य है -
 
‘किसी को परवाह नहीं –
न धर्म की, न शर्म की .
बस दौड़े जा रहे हैं सब –’
पुनः देखें -
‘हर रास्ता
ले जाता है बाजार तक .
वह रास्ता कहाँ है
जो ले जाए प्यार तक ?’ (रास्ते, पृ.8)

काव्य संग्रह ‘सुनो तो सही’ की कविताओं में मानवीय संवेदनाएँ अपने अंधतामुक्त  स्वरूप में उपस्थित हैं | अपनी कविताओं में कवयित्री ने मानवीय संवेदनाओं की प्रभावपूर्ण अभिव्यंजना हेतु साहित्यिक प्रतीकों के साथ- साथ इतिहास, दर्शन, लोक और मिथक के संदर्भों का भी यथायोग्य प्रयोग किया है | सामयिकता से लबरेज इन कविताओं को कल्पनाओं से कोई परहेज नहीं है | संग्रह की अधिकांश कविताओं में स्त्री की गरिमा के पक्ष में स्त्री-स्वर प्रबल है | स्त्री पक्ष की प्रबलता से अन्य पक्षों का अस्तित्व कहीं भी बाधित नहीं हो रहा है | हिंदी साहित्य-संसार में कवयित्री डॉ. पूर्णिमा शर्मा का यह सराहनीय अवदान साहित्यिकों की बौद्धिक भूख की शांति एवं सामाजिकों की बौद्धिक जागृति का निमित्त होने के साथ ही सामान्य पाठकों और सामान्य वर्ग के लिए उनके अपने जिए जाने वाले और बहुधा नकार दिए जाने वाले सत्यों से साक्षात्कार है |

समीक्षित कृति : सुनो तो सही / कवयित्री : डॉ. पूर्णिमा शर्मा / संस्करण : प्रथम (2017) / प्रकाशन : किंडल (अमेजन)  / मूल्य : 100 रुपए / पृष्ठ : 33             




















मंगलवार, 30 जनवरी 2018



हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
                                                     
आउटलुक पाठक साहित्य सर्वे 2011 के अनुसार ‘अनामिका’ सबसे प्रिय महिला कवि हैंI ‘कवि ने कहा’ शृंखला - संपादक ‘मदन कश्यप’ इनकी कविताओं में महादेवी वर्मा की घनीभूत पीड़ा एवम् करुणा का विस्तार देखते हैंI कविता के साथ साहित्य की अन्य विधाओं (निबंध,आलोचना,विमर्श,कहानी,उपन्यास ,संस्मरण,अनुवाद) में भी जीवन और जगत से जुड़े मार्मिक भावों की सरल और सहज भाषा में सफल अभिव्यक्ति देती हैं ‘अनामिका’ I
इनकी कृति ‘कवि ने कहा : अनामिका’ (2008) में सिर्फ स्त्री ही नहीं बल्कि परिधि पर खड़े सारे बिंदुओं को समेटने की कोशिश की गई है तथापि केंद्र ‘स्त्री’ हेतु सुरक्षित हैI इस स्त्री में अबलापन नहीं है, एक बिंदास अंदाज है जिससे स्त्री जीवन की कहानी में लगे ‘हाय’ शब्द का अस्तित्व ही डांवाडोल हो गया हैI उसका स्थान ‘हलो’ ने ले लिया है – “अबला जीवन ,हलो, तुम्हारी यही कहानी!/ ‘मुख पर डारे’ छोटी-सी मुस्कान / सुनो सब आनी-बानी!”/ (घूंघट के पट खोल रे, पृ. 70)I
इनकी संवेदनशील दृष्टी में यथार्थ और कल्पना का बेजोड़ संगम है, जो एक ओर हृदयस्पर्शी है तो दूसरी ओर मानवीय चेतना को झकझोरने में सक्षम भीI निर्जीव फर्नीचर का शापित प्रेमी होना एक कल्पना है, किंतु इसके साथ वर्तमान गृहस्थ जीवन में स्त्री – पुरुष के रिश्ते का यथार्थ जुड़ा हैI द्रष्टव्य है –“किसी जनम में मेरे प्रेमी रहे होंगे फर्नीचर,/ कठुआ गए होंगे किसी शाप से ये !/...जब आदमी ये हो जाएँगे,/ मेरा रिश्ता इनसे हो जाएगा क्या /वो ही वाला /जो धूल से झाड़न का ?” (फर्नीचर, पृ. 13)
 बेरुखी और मनस्ताप के इस रिश्ते में मन मार कर जीती स्त्री किस कदर एकांत क्षणों में भी दंभी पुरुष के फ्रस्ट्रेशन का शिकार होती है, देखें- “पाते ही कोना अकेला /दांत पीसकर कोहनी मारना और कहना -/ ‘सारी ये झंझट तुम्हारी उठाई हुई है ,/आफत का परकाला हो तुम ही !’ “ (कुहनियाँ , पृ.64)
 आज पौरुष अगर इसी अर्थ में बाकी है फिर कायरता भली ! माँ का आँगन छूटने के पश्चात् मिलने वाली नाजायज यातनाओं का प्रतिकार करने हेतु नारी शक्ति एवम् मानवीय विचारधारा के पोषक तत्व निरंतर तत्पर हैं I लेकिन उस लैंगिक भेदभावयुक्त व्यवहार का क्या जो घर की छत के नीचे हर पल किया जाता है ! मासूमों की मासूमियत को हरनेवाला यह पारिवारिक मापदंड कितना असहनीय है – “ ‘राम, पाठशाला जा !/ राधा, खाना पका !/ राम, आ बताशा खा !/ राधा, झाड़ू लगा !” ( बेजगह ,पृ. 11)| अहोभाग्य कितना दुलार पा रहे हो राम ! आनेवाले समय में इस दुलार का  
क्या प्रत्युत्तर मिलेगा सबको पता है | ‘दुलारू राम‘ जब ‘कमाऊ राम’ बन जाते हैं तब इनके फुर्सत के दो पल भी इनके वृद्ध अभिभावकों को मुश्किल से नसीब होते हैंI इन बूढी मांस-अस्थियों के ढांचे के नसीब में होता है-घर का एक निर्धारित कोना जहाँ सारे घरेलू कामों को निपटाना इनकी अनचाही पर अनिवार्य जिम्मेदारी हैI ऐसे में ये लहूलुहान हृदय और पथराई आँखें किन्हें भला कहेंगी ! “उन्हें सबसे अच्छे लगते हैं वे लोग / जो पास नहीं आते और कभी जान नहीं पाते/ कि छाले हैं छालों के भीतर ( वृद्धाएँ, पृ.82)I
जीवन के अंतिम चरण में भरेपूरे परिवार के मध्य अकेलेपन का दंश झेलती पीढ़ी की पीड़ा की अनुभूति से अभिभूत छोटी बच्ची का निम्न कथन यह संदेश देता प्रतीत हो रहा है कि बेटियों के साथ माँ-बाप अधिक सुरक्षित हैं  –“माँ, तुम बूढी मत हो जाना कभी !/...क्या पता –मैं कभी स्कूल में होउँ/और मच जाए भगदड़/तो कौन तुमको बचाएगा ?”(पत्ता-पत्ता ,बूटा –बूटा ,पृ-44)
माँ-बेटी के मध्य स्नेह की कड़ी के रेखांकन के पश्चात् अनामिका स्त्री के जीवन में ‘नैहर‘ के महत्व का रेखांकन करने हेतु विशिष्ट विशेषण ‘अगरधत्त अंगराई’ का प्रयोग करती हैंI प्रयुक्त विशेषण में निहित निश्चिंतता असीम सा है और अनिवार्य भी परंतु क्या इसमे स्त्री की पूर्ण सुरक्षा निहित है !  दरिंदगी जहाँ पलक झपकते ही समूची स्त्री काया को निगल जाने को आतुर है वहाँ अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्त्री स्वयं वहन करने में सक्षम है Iऐसी आत्म सक्षम स्त्री को चित्रित करते हुए कवयित्री लिखती हैं-“ वो जोरा-जोरी कि/उफ़,अम्मा, मैंने भी/ लेकिन हथियार नहीं डाले/कि जो बाजरा कूटकर / रोटियाँ खिलाई थीं तुमने-/ मैंने उनकी /सैरियत तो दी-“(केरल की एक लोकधुन पर आधारित,पृ. 66 )
हमेशा कहाँ सध पाती है यह पराक्रमशीलता ! परिणामस्वरूप स्त्रियाँ चकलाघरों की रौनक बन घुटने को विवश हैं I इनकी विवशता की पराकाष्ठा है -‘इस घुटनचक्र के कर्ता-धर्ता-भोक्ता के अमानवीय कुतर्क’ , देखें-“ ‘जिंदगी, इतनी सहजता से जो हो जाती है विवस्त्र/ क्या केवल मेरी हो सकती है?’ ”(चकलाघर की एक दुपहरिया, पृ.105)
इस समाज के जेहन में यह क्यों नहीं कौंधता कि जिंदगी की विवस्त्रता का उत्तरदाई कौन है ? मनुष्यता किसी कोने में बाकी होगी तो यह प्रश्न अवश्य झकझोर देगा हृदय को अन्यथा इस समाज में ‘बुद्ध’ सा बिड़ला कहाँ जिनका हृदय इन आम्रपलियो के लिए सखाभाव से ओतप्रोत हो! द्रष्टव्य है –“पर बुद्ध ने मेरा मान ही रखा / और कहा- ‘रह जाएगी करुणा, रह जाएगी मैत्री,/ बाकी सब ढह जाएगा...’ “ (आम्रपाली,पृ. 88) I स्त्री-पुरुष के मध्य सखाभाव का विस्तार होना स्वस्थ समाज हेतु अनिवार्य हैI इस लक्ष्य की पूर्ति कर सकना बहुत सरल नहीं है कारण कि पुरुषवादी मानसिकता स्त्री-पीड़ा जनित कराह से तृप्त होने का आदी हो चुका है I “और इस पूर्ण रास के साक्षी-तारे /टभ- टभ टभकते हैं भर –रात/ पीठ पर /फफोलों के मानिंद ! (चोटें, पृ.81)I कृति की ‘जुएँ’ एवं ‘चिट्ठी लिखती हुई औरत’ कविताओं में जिस ‘खटराग’ एवं ‘शताब्दियों का संचित ‘ की बात की गई है वह स्त्री की इसी कायिक पीड़ा की मानसिक वेदना का प्रतीक जान पड़ता हैI इन यंत्रणा अधिकारियों को किस दृष्टीकोण से ‘पति’ या ‘पुरुष’ की श्रेणी में रखा जाए? समय सकारात्मक दिशा में बदल रहा है I स्त्रियाँ अपने अस्तित्व को तवज्जो दे रहीं हैं और सामनेवाले से भी उनकी यही अपेक्षा है –“ हम भी इंसान हैं-/ हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर /जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद /नौकरी का पहला  विज्ञापन!/ देखो तो ऐसे /जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है /बहुत दूर जलती हुई आग !(स्त्रियाँ ,पृ. 9-10)I पितृसत्तात्मक रवैयों को दरकिनार करते ही एक अनोखे सुकून का अहसास होता है, इसी क्रम में तुलसी के व्यवहार से खिन्न और आत्मविश्वास से पगी रत्नावली प्रतिज्ञाबद्ध होती हैं –“ अपने झोले में ही !/अब निकलूँगी मैं भी / अपने संधान में अकेली !/आपका झोला हो आपको मुबारक !” (तुलसी का झोला, पृ.77)I आत्मनिर्भर स्त्री की छवि की स्थापना के साथ ही अनामिका ने स्त्री शुचिता के पारंपरिक मिथक को कटघरे में खड़ा किया है I
इन्होंने वात्सल्य,बालमनोभाव, बेरोजगार की मनोदशा, सत्य के श्रेणीगत विभाजन की सत्यता, भूमंडलीकरण के दौर में दूर-दराज से आए बच्चों की अभावजन्य (घर,भाषा,धन का संदर्भ) संघर्षशील जीवनचर्या, शिक्षा-पद्धति, तथा अंग्रेजी-भाषा , जैसे विविध विषयों को समेटते हुए जीवन की सच्चाई को व्यावहारिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया है I ऐसे में अनायास ही उनकी व्यंगात्मक दूरदर्शिता का परिचय मिल जाता है –“ भूखे ही ऐंठ रहे लोगों को भी / खाने को मिल जाता है धोखा!” (धोखा,पृ.53)
अनामिका की कविताओं से गुजरना एक खाश भाषाई दुनिया से गुजरने जैसा है जो ठेठ उनकी अपनी है I इस भाषा में जहाँ एक ओर पुराणों और मिथों के संदर्भ हैं, विदेशी साहित्य की अंतर्कथाएँ गुँथी हुई हैं वहीं भारत के गाँव,घर,दलान की सहज शब्दावली का सौंदर्य झिलमिला रहा है I उपर से अभिजात प्रतीत होनेवाली यह भाषा कई बार भीतर से देशी लगती है – एक ऐसा देशीपन जो आज दुर्लभ होता जा रहा है I कुछ शब्द देख लें – चुटपुटिया, दुधमुहाँ, इत्ती-सी, बोरसी, लव-कुश, ईसामसीह, अंचरा, चकर-पकर , काढकर, कुहनियाना, बुद्ध, आम्रपाली, भुरभुरा, राकस, दुधार, बिसात, द्रौपदी की साड़ी,सीता,कठुआ इत्यादिI एक और खाशियत इनकी कविताओं में हमारा ध्यान खींचती है –वह है स्त्री की काया भाषा का मुखर उपयोग Iइन्होंने विभिन्न भावों को प्रकट करने के लिए विविध भंगिमाओं और संकेतों का मनोरम प्रयोग किया है जिससे इनकी कविता की संप्रेषणीयता बढ़ गई है , उदाहरणस्वरूप :

1.       पैंतालीस डिग्री की अंगराई लेती है /क्या-क्या हिसाब बिठाकर ! (बम, पृ.43)

2.       इस अँधियारे कमरे में यों / टीन खुरचती आटे की ? (उड़ान, पृ.94)

3.       क्यों होती हैं उसकी आँखें/ जैसी वे होती हैं-/ तकलीफ की थोड़ी चमक/ और हल्की थर्राहट के बीच (चमक के अलावा, पृ. 121)

4.       गिरकर उठें तो कहें-‘घुटनो, धन्यवाद.../कितना अच्छा है कि/तुम फूटकर भी/फूट नहीं लेते अलग , (रियाज़, पृ.115)

5.       लाल काँच की चूडियों से/ पेंडुलम की तरह लटका/ लगातार डोलता ही रहता था/ एक जंगाया-सा सेफ्टी पिन ! (सेफ्टी पिन, पृ. 97)

6.       जोर से दहाड़ते थे मालिक और एक ही डांट पर/ एकदम पट्ट/लेट जाती थीं वे/दम साधकर, /.../रोज-रोज मरने में /एक बार शरमाती, लेकिन फिर कुछ सोचकर / मर ही जाती , (पतिव्रता, पृ.18)


[समीक्षित कृति – कवि ने कहा : अनामिका / कवयित्री : अनामिका,/ प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली,/ संस्करण :  2008,/ मूल्य : रु.150/- ]

बुधवार, 16 नवंबर 2016

ऑनलाइन पत्रिका प्रतिलिपि

समाज के हर कोने में झाँकती प्रतिलिपि
                                                                चंदन कुमारी
सर्वथा स्वतंत्र ऑनलाइन मैगज़ीन ‘ प्रतिलिपि ‘ का शुभारंभ अप्रैल 2008 में गिरिराज किराडू , राहुल सोनी एवं शिव कुमार गाँधी द्वारा किया गया | यह द्विभाषी / बहुभाषी एवं बहुलिपि पत्रिका जो नित नूतन निखार व उन्नयन को प्राप्त हो रही है उसका श्रेय रचनाकारों के लेखकीय सहयोग , संपादक मंडल व प्रतिलिपि परिवार के समस्त सदस्यों को जाता है साथ ही उन साहित्य रसिकों को भी जो इस पत्रिका के पाठों का पारायण करते हैं | यह महज पत्रिका नहीं , प्रमाण है विविध क्षेत्रोँमें कार्यरत युवाओं के उस हिंदी प्रेम का जो उन्हें इस ओर रचनाधर्मिता के निर्वाह की प्रेरणा दे रहा है |
प्रतिलिपि पत्रिका (4/8/2016) में प्रकाशित रचनाओं का सरोकार देश , समाज , व्यक्ति और प्रकृति से बराबर का है | समाज की धुरी में बंधे जीवन के हर पोर को छूने की कोशिश इन रचनाकारों की रचनाओं में साफ झलक रही है | सामाजिक व्यवस्था के गुण-दोष के साथ ही वैयक्तिक संवेदनाएँ भी यहाँ मुखर स्वर में अभिव्यक्त हुई हैं |
पत्रिका में संकलित रचनाओं में प्रेम केंद्रित कविताओं की बहुतायत है | प्रेम के स्वरूप वैविध्य (पीड़ा, धोखा, उलझन, शुकून) से रूबरू कराती रचनाएँ हैं – गजल कह रहा हूँ (मुकेश नास्तिक), प्रेम (दीप्ति शर्मा), प्रेम जैसा कुछ (नवनीत), सुनो प्रेयसी , लडकियों के शयनकक्ष में (आयुष झा आस्तिक) इत्यादि | न सिर्फ पद्य बल्कि गद्य के माध्यम से भी प्रेम का पक्ष पत्रिका में उपस्थित हुआ है | कहानी ‘बुजुर्ग कदम – युवा मन’ में प्रेम-विवाह की अस्वीकार्यता के परिणाम एवं उससे उत्पन्न असंतोष एवं पछतावे को अंकित किया गया है | ‘रिश्तों की बैलेंस शीट’ कहानी पुराने विवाहेतर प्रेम संबंध और नई-नवेली दोस्ती के आमने-सामने आते ही रिश्तों के रिआर्गेनाईजेशन की बात रखता नजर आता है |
स्त्री होने के मायने (चंद्रशेखर कुमार) कविता में भोगवादी समाज की कुत्सित मानसिकता के सामने माता-पिता की विवशता का चित्रण किया गया है साथ ही ग्रामीण स्त्रियों के लिए स्त्री होने के सबब का उल्लेख भी यहाँ मिलता है | ग्रामीण पृष्ठभूमि की कहानी बचाओ- बचाओ में स्पष्ट किया गया है कि विपन्नता न तो असमर्थ होती है ना ही सशक्तता से खाली | उस परिस्थिति में जीने वाले भी अपने अस्तित्व रक्षण में पूर्णरूपेण सक्षम होते है | पर विपन्नता पीछा नहीं छोडती | उसके जीवन पर हावी होने का प्रत्यक्ष उदाहरण है बालश्रम | ‘आज फिर कोई कविता लिखूँगा’ (मिथिलेश कुमार) कविता में दही बेचती छोटी लड़की इसका प्रमाण है | जीवन है तो कठिनाइयों से सामना होना ही है , बड़ी बात है उनके रहते उम्मीदों को न टूटने देना – कुछ ऐसी ही बातों से आशावाद का संचार करती कविता है ‘जीवन तो चलता रहेगा ‘ (खुशबू जैन) | आशाएँ हर बार पूरी हो जाएँ यह संभव नहीं है | ‘नीलामी’ कहानी एक बेटे के पिता की आशाओं के प्राणांत की कहानी है जो बरबस ही दहेज-प्रथा की ओर हमारा ध्यान खींचता है | पत्रिका की कई कहानियाँ सामाजिक विसंगतियों को लक्ष्य कर लिखी गईं हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं -                  

     सामाजिक विसंगतियाँ                               कहानी
1.        बहुविवाह , देहव्यापार                                   रुखसाना (प्रज्ञा तिवारी)
2.       घरेलू हिंसा                                            चेहरा / नकाब
3.       लिंगभेद की तुच्छ मानसिकता                             माफ़ी (मोना कुमारी)
4.       आर्थिक लोलुपता , पारिवारिक विभाजन                      बँटवारा
समाज की इस दारुण स्थिति में शिथिल पड़ती संवेदना एवं लुप्तप्राय मानवता कविता ‘कर दीजिए क़त्ल’ में चिंतन के विषय बनकर उभरे हैं | इस पत्रिका में सिर्फ समाज का वीभत्स पक्ष ही अंकित नहीं हुआ है | समाज में उपस्थित सौम्यता को भी रेखांकित किया गया है | सौम्यता का चरम दर्शन माँ के प्रेम में होता है | इस प्रेम को दर्शाने वाली कहानियाँ हैं–अँधेरी दीवाली (अफ्शां फातिमा), जननी माँ और ममता | कहानी ‘वनवास’ और ‘दूर की बात’ (रचना व्यास) में स्पष्ट किया गया है कि व्यावहारिकता के आगे प्रबलतम सिद्धांत भी कमजोर पड़ जाते हैं | परंतु हमारे देश के प्रहरी जिन्हें ‘फुर्सत मिली तो’ (विशाल क्षेत्री) कविता में “सैनिक संत” की संज्ञा दी गई है , अपने वतन की रक्षा के लिए अपने जान की बाजी लगा देनेवाले अपने सिद्धांत को कभी भी कमजोर पड़ने नहीं देते |
‘रोहित बेमुला की मौत पर’ ,‘देश की तस्वीर’ (पंकज कुमार शाह) एवं ‘उम्मीद’, ‘अधूरी कहानी’ (अर्चना कुमारी) इत्यादी कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं | ‘फाइन प्रिंट’ एवं ‘जोंक’ (कुमार लव), इन  कविताओं में आत्मीयता और अजनबीपन का साहचर्य साधते मानव जीवन की त्रासदी और मानव मन की गुत्थ्म्गुत्थी की अभिव्यक्ति के लहजे में उत्तरआधुनिकता की झलक मिल रही है | लाक्षणिक प्रयोगयुक्त इन कविताओं की विशिष्टता है कि यहाँ पाठ के भीतर पाठ छिपा हुआ है जिसे हर साहित्यिक या पाठक अपनी अनुभूति के स्तर पर अनुभूत कर सकता है |
यह अनुभूति के स्तर की हेरा-फेरी ही तो है कि आजादी के मायने भी सबके लिए एक से नहीं हैं | ‘निर्भरता से आजादी’ (दर्शिका केशरवानी) पाठ में आजादी के सही मायनों को उजागर करने की कोशिश की गई है | इसी प्रकार ‘अनार’ और ‘आम्रपाली’ की आपसी बातचीत के माध्यम से पाठ ‘आम्रपाली’ (अंशुमाला) में ‘सबै दिन जात न एक समान’ वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है | यहाँ स्पष्ट किया गया है कि भविष्य की चिंता में वर्तमान की खुशियों को नजरंदाज कर जाना बुद्धिमत्ता नही है| यह तथ्य सामान्य मनःस्थिति के लोगों के लिए है परंतु जिनकी मनःस्थिति ही असामान्य हो उनके लिए तो सब एक सा है – बेमतलब का | लघुकथा ‘कमरा न. 42’ (रेणुका चीटकारा) ऐसे ही लोगों के एक नम्बर बन अस्पताल में रह जाने की विवशता की कहानी है | इस दारुण स्थिति के उस दूसरे और सुखद पक्ष का उद्घाटन करती है कहानी ‘नाईस स्माइल सर’ (अभिनव सिंह) | यह एक मानसिक असंतुलन की शिकार लड़की के सामान्य होने की कहानी है | इसमें जहाँ अपने पेशे के प्रति इमानदारी दिखाई गई है , आदमियत दिखाई गई है वहीं गृह कलह के भयावह दुष्परिणामों से भी अवगत कराया गया है |
पत्रिका की कहानी ‘शोभा’ पर्यावरण चेतना से संपन्न प्रतीत होती है तो कहानी ‘y क्यों’ (संजना तिवारी)’ सामाजिक कुंठा और कुत्सित मानसिकता का बयान लगता है | विपरीत परिस्थितियों के समक्ष अपनी सशक्तता साबित करती स्त्रियों को समाज का सबल पक्ष मानती कुछ कहानियाँ हैं – ‘भेड़िया’ (योगिता यादव), ‘सौभाग्यवती भव’ , ‘जिरह’ इत्यादी | इस तथ्य से भी इंकार नही किया जा सकता कि सशक्तता के बावजूद भी लोग त्रस्त हैं ! भेड़ियेपन के आतंक से त्रस्त ! विमर्शों और विचारों की रोज हो रही बढ़त से इस आतंक की तोड़ न जाने कब निकले ! एक और त्रासदायक स्थिति है – वह है आकाश छूतीं मंहगाई जिसका जिक्र ‘मंहगाई के नाम पत्र’ (अरुण गौड़) में किया गया है | यहाँ आम जनता पर मंहगाई के दुष्प्रभाव का अंकन किया गया है साथ ही इससे अप्रभावित नेताओं और अधिकारियों पर भी बेबाक टिप्पणी की गई है |

पत्रिका ‘प्रतिलिपि’ में संकलित जागरूक एवं संवेदनशील नई पीढ़ी की रचनाएँ आश्वस्त करतीं हैं कि संवेदना के सागर में कुछ जल अभी शेष है जो संभवतः एक उम्मीद जगाती है सुव्यवस्था के पुनः आगमन की |  

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

उत्तर आधुनिक साहित्यिक परिदृश्य : गर्भ में


                  आशाएँ अभी शेष हैं : गर्भ में  
                                          चंदन  कुमारी                        
तेलंगाना के युवा हिंदी कवि ‘ कुमार लव ‘(1986) कविता के साथ ही लघुकथा, कहानी व उपन्यास जैसी अन्य साहित्यिक विधाओं में भी अपनी दखल रखते हैं | एक सक्रिय ब्लॉगर के रूप में भी इन्होंने अपनी पहचान बनाई है | अल्पायु में ही लगभग 500 से भी अधिक कविताएँ रचनेवाले इन्हीं कवि की नई नकोर कविताओं का संग्रह है “ गर्भ में “(2015)|
एक जीव के जीवन पथ पर अग्रसर होने का प्रथम बिंदु है ‘ गर्भ ‘ और काव्य संग्रह “गर्भ में” उस पथ की खट्टी-मीठी-कड़वी अनुभूतियों का सहज बोधगम्य पाठ है | कुल 79 कविताओं का यह संग्रह छः खंडो में विभाजित है जो इस प्रकार हैं – 1. विसंवाद (13 कविताएँ) 2. किसलिए (8 कविताएँ) 
3. धमनी विस्फार (11 कविताएँ) 4. क्रोकोडाइल (9 कविताएँ) 5. कत्तनवाली (18 कविताएँ) 6. हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया (20 कविताएँ) |
“गर्भ में” (2015) में संग्रहित कविताओं की अपनी विषयगत विविधताएँ हैं | इन कविताओं में स्वप्न भी बुना जा रहा है और यथार्थ भी जिया जा रहा है | बदहाल समाज, किशोरवय का रोमानीपन, मानसिक कुंठा और स्वतंत्र व सशक्त मन का आह्लाद – सभी कविताओं के जरिए अभिव्यक्त हो रहे हैं | इन विविधताओं के साथ ही इन कविताओं में एक साम्यता है | वह साम्यता है – उत्तरआधुनिक साहित्यिक परिदृश्य की उपस्थिति ! इस उपस्थिति को जानदार बनाने के लिए दृश्य और अदृश्य जगत को मिलाकर, अतीत और वर्तमान के संदर्भो को जोड़कर कई अभिनव प्रयोग किए गए हैं | अपने प्रयोगों की साहित्यिक दुनिया को कवि ने दैनंदिन जीवन के आम क्रियाकलापों से भी जोड़ा 
है | द्रष्टव्य है – “ खिचड़ी की थाली-सा चाँद मुझे चिढ़ाता रहा | “ (सपनों की टोली, पृ.115) | यहाँ ‘चिढ़ाने ‘ शब्द के लिए ‘खिचड़ी की थाली ‘ का प्रयोग किसी लोकगीत का स्मरण कराते हुए भी चिढ़ाने के संदर्भ में सर्वथा नवीन है और सटीक भी | पुनः देखें- “ अश्वमेध” (चार आँखों वाला कुत्ता, पृ.135) की तर्ज पर “ नरमेध “ (मुखिया जी,पृ.75) शब्द का प्रयोग न सिर्फ नयापन लिए हुए है वरन यथार्थ के नग्न चित्र की उपस्थिति का सूचक भी प्रतीत होता है |
सरल शब्दों में रची गई इन कविताओं में निहित अर्थ गाम्भीर्य वैयक्तिकता और सामाजिकता से जुड़े अनगिणत त्रासदीयुक्त यथार्थों की सहज अभिव्यक्ति जान पड़ते हैं | इन्हीं सहज अभिव्यक्तियों के आवरण में लिपटा है विचारों का वह वबंडर जो सुप्त चेतना को जगाना चाहता है | द्रष्टव्य हैं कुछ ऐसे यथार्थ –
    1.      कल यह भी बन सकती है एक नंबर       
    4, 5, 6, 10, 12
    या अब तक दिखी सबमें
    सबसे भयावह, the worst
                  (कीचड़ में नन्ही पड़ी ,पृ.48)
 2.      उलटे उसने कहा
    यहाँ नहीं !      (उलटी ,पृ.77)

 3 . माथे पर इनके
           गुदा है
     सोच जहाँ से निकल गई है
     और प्रोग्राम  अंदर बैठ गया है | (घृणातीत, पृ.47)

 4 . गंध आती भी है तो
     कुत्ते की होगी सोच
        कोई देखता नही !  (द्वंदातीत पृ.34)

 5. टी वी पर एक कवि का खून बह रहा था
         कुछ पल्ले नहीं पड़ा
            मुँह फेर
         फिर सो गया |    (विसंवाद पृ.22)

जगबीती प्रतीत होने वाली ये सारी बातें और ऐसी कई अन्य बातें जिनका उल्लेख यहाँ नहीं है परंतु समीक्ष्य कृति ‘ गर्भ में ‘ में है किसी-न-किसी की आपबीती हैं | त्रासदी यह है कि समाज भावधर्माओं का समाज बनता जा रहा है जहाँ इन तथ्यों की अद्यतन जानकारी रखना भर पर्याप्त
है |  जल में डूबते डंक मारने वाले जीवों की रक्षा करने वाले मनुष्यों की मनुष्यता आज स्वतः डूबती मालूम पड़ती है| एक निपुणता हाथ लगी है ! अवसर को लोक लेने की कला में माहिर होते मनुष्य आसानी से अपनत्व भी भूल जाते हैं | देखें –
 “छोड़ आए थे उसे अकेला / वही सब जिन्हें बचाने को / रुका था वह वहाँ!” (किसलिए,पृ.44)
मित्रता का ऐसा हश्र देख कवि मन को अनगिणत कलिकाओं वाले आलू का संग भला लगता है | सच्ची मित्रता तो बस हो जाती है वहाँ सोच-विचार की गुंजाइश नहीं होती | कवि कहते हैं-“ देखते रहते सदा /अनगिणत छोटी आँखों से मुझे /पागल समझ फिर भी कभी मुझ पर हँसते नहीं” (मेरे दोस्त आलू,पृ.126) |
जीवन के रंगमंच पर मनुष्य रूपी कठपुतली का खेल है यह संसार जहाँ किसी के हिसाब से कुछ नही घटता है | कहना गलत न होगा कि चाँद के लिए सही नाप का झिंगोला सिला जाना जितना मुश्किल है उतना ही मुश्किल है इस संसार में इंसान के लिए खुद को फिट कर पाना | कुमार लव के शब्दों में – “ जहाँ जकड़नी चाहिए मुझे / वहाँ तो बहुत ढीली है,/ वरना – बहुत ही तंग,/ बहुत तंग | (गलत नाप, पृ.40)|
कविता “हूँ – 2” (पृ.59) ‘ अति संघर्षण जौं कर कोई अनल प्रगट चंदन ते होई ‘ वाली उक्ति  का स्पष्टीकरण प्रतीत होता है | ” तेरे कैनवास दे उत्ते “ (पृ.84-85) शीर्षक कविता में सपने और अधबने रिश्ते के बीच की सच्चाई को कहने की कोशिश झलकती है | कई कविताएँ हैं जिनमें कवि ने यह दिखाने की चेष्टा की है कि किस कदर शब्द खामोशी में अंतर्हित हो गए हैं और प्रेम का चांचल्य शिथिल पड़ गया है | इस काव्य संग्रह की “उल्लंघन” (पृ.59) शीर्षक कविता जहाँ सरदार भगत सिंह के जन्मदिन से संबद्ध है तो वहीं “Rimbaud” (पृ.66) का संबंध फ्रेंच कवि आर्थर रिमबाउड से है | संग्रह की कुछ कविताएँ बहुत छोटी व कुछ लंबी भी हैं |
समीक्ष्य काव्य संग्रह का शीर्षक ” गर्भ में “ मुझे आशावाद का द्योतक जान पड़ता है और पूर्णरूपेण सार्थक भी ! गर्भ के भीतर की दुनिया कितनी अंधेरी होती है ! पर उसके भीतर पलता भ्रूण अकुलाता नहीं ! वह वहीं अपनी सुरक्षा को महसूसता हुआ पलता रहता है , कुछ इस तरह – “अँधेरा छाता 
रहा / गर्माहट आती रही / और मैं छुप गया / उस गर्भ में / सुरक्षित / पूरी तरह से | ” (गर्भ में, पृ.131) |
इस पुस्तक की भूमिका (पृ.xiii) में प्रो. गोपाल शर्मा के उद्गार – “ ... कुमार लव ने यह सृष्टि रचकर प्रजापतित्व (अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापतिः) प्राप्त किया है , इसमें संदेह नहीं| “ के लिए कुमार लव निश्चित ही बधाई के पात्र हैं |
देरिदा के विखंडन के सिद्धांत में अब्राम्स के अनुसार दो पाठों की बात की गई है| पहला अनुकूल पाठ रचयिता के आशय के पास पहुँचने की कोशिश करता है तो दूसरा प्रतिकूल पाठ उसके द्वारा दबाए गए आशयों को खोजता है | ऐसे में सहज संभव है कि व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण के अनुसार एक ही कृति के कई पाठ हों| हर कोई अपना पाठ बना सके इसके लिए आवश्यक है कवि के पाठ में प्रवेश करना ! आएँ चलें गर्भ में !
समीक्षित कृति : गर्भ में / कवि : कुमार लव / संस्करण : 2015 / मूल्य : 300 रु / प्रकाशन : तक्षशिला प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या : 136 |