पुस्तक चर्चा
खींचो
न कमानों को
संपादकीयम,
समकाल से मुठभेड़, सवाल और सरोकार, लोकतंत्र के घाट पर, कोरोना काल की डायरी के बाद समसामयिक ज्वलंत
मुद्दों पर अपनी विशेष चर्चा के साथ प्रो.ऋषभदेव शर्मा की नव्यतम कृति ‘खींचो न कमानों को’ वर्ष 2022 के प्रवेश के साथ पुस्तकप्रेमियों के लिए उपलब्ध है| हैदराबाद के प्रतिष्ठित अखबार हिंदी मिलाप में 6 सितंबर 2021 से 20 जनवरी
2022 तक प्रकाशित कुछ विशिष्ट संपादकीय टिप्पणियों का संग्रह है- ‘खींचो न कमानों को|’ निहितार्थ स्पष्ट है कि जब गुत्थियाँ बुद्धि से सुलझाई जा सकती है तो फिर
तलवारें म्यान में ही रहें तो बेहतर है| एक जमाना था जब
अखबार केवल जन की आवाज होती थी| आज दौर बिक्री और
खरीद-फरोख्त का है, मुखौटों का है इसमें कौन खरा और कौन
कच्चा?
समीक्ष्य कृति में कुल 7 खंड हैं|
इन सात खंडों में स्थानीय, राष्ट्रीय और
अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े कुल 70 टिप्पणियाँ हैं जिन्हें बहुत खूबसूरती के
साथ वर्गीकृत कर उनका नामकरण किया गया है| उपलब्ध या रचित
सामग्री का उचित वर्गीकरण और योग्य नामकरण करने की कला को विद्वजन भी साहित्यिक
संस्कार मानते हैं| प्रो. शर्मा की कृतियों में इसकी आकर्षक और
उचित उपस्थिति हमेशा ही रहती है| कृति खींचो न कमानों को का
वर्गीकरण और नामकरण देखें- ‘पहला
खंड है काहे को दुनिया बनाई!| इसमें 22 टिप्पणियाँ हैं|
दूसरा खंड है शतरंज के खिलाड़ी| इसमें 16
टिप्पणियाँ हैं| तीसरा खंड है हमारा समाज जिसमें 10
टिप्पणियाँ हैं| चौथा खंड किसान आंदोलन में तीन टिप्पणियाँ
है| पाँचवाँ खंड हरित विमर्श में भी तीन टिप्पणियाँ हैं|
छठा खंड शांति की प्रतीक्षा में 7 टिप्पणियाँ हैं| सातवाँ और अंतिम खंड है विविध सरोकार जिसमें 9 टिप्पणियाँ हैं|’
समाज का हालेदिल बयान करने की अपनी
बेमुरब्बत चाह के साथ ही व्यंग्य की धारदार टिप्पणी देने से लेखक कतराते नहीं हैं| जैसे अफगानिस्तान पर तालिबानियों के कब्जे के बाबत लेखक का यह लिखना कि
इसमें कोई दोराय नहीं कि गणराज्य के इस युग में तालिबान का राज ‘गन’ राज्य है! बंदूक की नोंक पर तालिबानी अपनी मनमानी न सिर्फ अफगानिस्तान पर
कर सकते हैं या करते रहे हैं बल्कि भारत जैसे अन्य देश भी जो उसकी मित्र सूची के
बाहर हैं वे गंभीर खतरे की रडार की रेंज में हैं| गंभीर और
उलझे हुए मसलों पर बड़ी सुलझी हुई टिप्पणी यहाँ देखने को मिल जाती है| जैसे क्वाड (चतुर्भुज समूह) की शिखर बैठक को ही लिया जाए| अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत
और जापान – इन चार देशों के इस समूह
का दायित्व हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त रखने के लिए हुआ है| ये चारों देश चीन से त्रस्त हैं| इसका कारण भले ही
राजनैतिक, आर्थिक या जगह हड़पने की नीति से संबद्ध हो| प्रो.शर्मा के अनुसार चूँकि चीन ने इन सबको अपनी हरकतों से त्रस्त कर रखा
है इसलिए यह स्वाभाविक है कि वह इन्हें अपना विरोधी समझे| पाकिस्तान
की ओर रुझान के बावत रूस द्वारा भारत पर बनाया गया दबाव निहायत ही रूस की गैर
जिम्मेदाराना हरकत है| “कहना न होगा कि रूस का यह आचरण उदारवादी अर्थव्यवस्था वाले ग्लोबल समाज की
रीति-नीति के मान्य सिद्धांतों के खिलाफ है|” (17/09/2021) ऐसे बेखटके टिप्पणी
कर देना उसके ही बूते की बात हो सकती है जो लंबे समय से बदलती स्थितियों का जायजा
लेता रहा हो|
तालिबान राज में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से निर्वासित करने की नीति पर
निशाना साधती हुई टिप्पणी का शीर्षक है- ‘तालिबान की स्त्री-द्रोही नैतिकता’ | इसी प्रकार दुनिया में सभी देशों के साथ बदलते समीकरणों और उससे उत्पन्न
प्रभाव की चर्चा करने के साथ ही भारत की निहायत ही घरेलू चर्चाओं को अपने संपादकीय
में लेखक ने स्थान दिया है| राजनीतिक दांव-पेंच, लखीमपुर खीरी की हिंसा, राज्यों से लेकर अड्डों तक
के नाम बदलने की नीति के साथ कांग्रेस पार्टी की
माली हालत पर भी निशाना साधा है, देखें- “उन्होंने कृषि कानूनों, लखीमपुर
खीरी की घटना, अर्थव्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और जम्मू-कश्मीर
में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने को लेकर भाजपा सरकार की आलोचना तो की, लेकिन इस प्रश्न से खुद को बचा लिया कि उनकी पार्टी इन सब समस्यायों के
बीच सार्थक और सटीक विपक्ष की भूमिका में खरी क्यों नहीं उतर पा रही है!”(20/10/2021)
हिंदुत्व के मुद्दे पर सलमान खुर्शीद
की अवांछित बहस, केजरीवाल की चुनावी रणनीति का एक
हथकंडा मुफ्तवाद तथा विभिन्न चुनावी समीकरणों पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने न्याय
व्यवस्था की दशा का बयान भी किया है जो इस
प्रकार है- “जब लोग पिछले अनुभवों
से यह जान जाते हैं कि उनकी निगाह में गंभीर अपराध की घटनाएँ भी लंबे समय तक लंबित
और अनिर्णीत पड़ी रहती हैं, सरकारें और अदालतें कोई फैसला
करती नजर नहीं आतीं; तो वे खुद फैसले पर उतारू हो जाते हैं!
यह कानून के डर का खत्म होना नहीं, बल्कि व्यवस्था की न्याय
क्षमता के प्रति चरम अविश्वास का प्रतीक है| इसलिए जनता और
उसकी आस्था को दोषी ठहराने से पहले उसे इस आपराधिक कृत्य के लिए प्रेरित करने वाले
तत्वों की भी निशानदेही होनी चाहिए|” (22/12/2021) यह पंजाब में हुई बेअदबी की घटनाओं के संदर्भ से संबंधित है|
युवक की बेअदबी का जवाब भीड़ ने उसकी हत्या से दिया| यह अनुचित था| बे-चेहरा भीड़ का यह जंगल न्याय समाज
में अपनी जड़ें क्यों पसार रहा है? प्रो. शर्मा इसके दो कारण
बताते हैं- एक धार्मिक आतंकवाद और दूसरा राज्य की निरीह कानून व्यवस्था| यदि इन स्थितियों से निपटा नहीं गया तो समाज में अराजकता का बोलबाला होगा,
अमन का नहीं|
जन्मदिन,
मंदिर और जुर्माना शीर्षक टिप्पणी के अंतर्गत आप देख सकते हैं कि
समाज में जातिप्रथा और छुआछूत का भाव आज भी कई स्थानों पर अपने चरम पर है| दलितों का आज भी मंदिर में प्रवेश वर्जित है| यह
स्थिति बहुत विडंबनापूर्ण कही जा सकती है कि एक उच्च अधिकारी या संपत्तिवान
व्यक्ति का सम्मान बिना उसकी जात पूछे; सभी करते हैं पर
अधनंगा, भूखा, मलिन, फटेहाल व्यक्ति भले ही ब्राह्मण क्यों न हो; सम्मानित
कम ही होते होंगे! आजाद भारत में केवल छुआछूत ही नहीं, ‘बाल-विवाह, बच्चों के साथ ऑनलाइन दुर्व्यवहार,
बाल श्रम, बाल तस्करी, लिंग
आधारित हिंसा के मामलों में कोरोना काल में निरंतर वृद्धि हुई है|’ (06/10/2021) ये तथ्य एनसीआरबी तथा क्राई
द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर लेखक द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं| इसी प्रकार सूत्रों के अनुसार भारत में भूख और भुखमरी की समस्या में भी
वृद्धि आई है | एक रिपोर्ट के अनुसार “भारत में कोविड-19 की वजह से लगाए गए प्रतिबंधों
ने आम लोगों की जिंदगी को बुरी तरह से प्रभावित किया है, जहाँ
दुनिया भर में ‘बच्चों की बर्बादी’ की दर सबसे ज्यादा है|” (18/10/2021) आज पूरा भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है| क्या अमृत महोत्सव जब अपने नौनिहालों के कंठ में एक निवाले का उपाय नहीं!
विकास हो रहे हैं पर जितना विकास हुआ है उससे कई गुणा होना अभी बाकी है! असली भारत
की तस्वीर दूर-दराज के इलाकों में आज भी दिखाई देती है! सुविधाओं से रहित उस भारत
की चौखट पर शायद कभी चुनावी रौनक जाती हो!
बारिश से बेहाल उत्तराखंड,
किसान जीवन और संबंधित नीतियों एवं प्रकरण, जलवायु
हितैषी जीवन शैली, आतंक, जम्मू कश्मीर
से जुड़ी रणनीति, स्त्री द्वेष के मंच इत्यादि विषयों पर अपनी
टिप्पणी देते हुए घरेलू भाषा से शक्ति की भाषा...शीर्षक के तहत हिंदी के पक्ष में लेखक
का तर्क है कि हिंदी केवल घरेलू भाषा और मातृभाषा ही नहीं, विविध
मातृभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोक्ता भाषा-समाजों की संपर्क भाषा, जन भाषा और राष्ट्रभाषा अर्थात भारतीय अस्मिता की प्रतीक अक्षेत्रीय भाषा
भी है| संविधान में उसका राष्ट्रभाषा के रूप में उल्लेख न
किया जाना और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उसे अव्यक्त रहने देना ‘राजनैतिक चतुराई’ के सुंदर नमूने हैं!
कृति के शीर्षक ‘खींचों
न कमानों को’ की
तथता बनाए रखते हुए लेखक ने कई पोलों और घालमेलों को परत-दर-परत उघाड़ने की जो चेष्टा
की है उसके जरिए एक सजग पत्रकार से
मुलाक़ात होती है|
समीक्षित कृति: खींचो न कमानों को
लेखक: ऋषभदेव शर्मा
प्रकाशन: श्री साहिती प्रकाशन, हैदराबाद
संस्करण: प्रथम,
2022
पृष्ठ: 148
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