मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

सुनो तो सही


सुनो तो सही



ज्ञानतत्व और स्नेहभरित मन की संयुक्त अभिव्यक्ति डॉ. पूर्णिमा शर्मा (1965) प्रतिष्ठित समीक्षक, लेखिका और कवयित्री होने के साथ-साथ हैदराबाद स्थित “हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच”  नामक साहित्यिक संस्था की माननीय उपाध्यक्ष हैं | इन्होने मासिक स्तंभ ‘प्रसंगवश’ का कई वर्ष तक प्रकाशन किया है | समीक्ष्य काव्य संग्रह “सुनो तो सही (2017)” इनकी सद्यःप्रकाशित रचना है जिसका किंडल संस्करण अमेजन पर पठन-पाठन एवं प्राप्ति हेतु उपलब्ध है |

इनकी विद्वता का उल्लेख वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् प्रो.सियाराम तिवारी ने अपने आलेख “हैदराबाद जैसा मैंने देखा” में किया है | ‘परम पुनीता, गुरुमाता डॉ. पूर्णिमा शर्मा को सादर समर्पित’ यह समर्पण वाक्य डॉ. अनुपमा तिवारी ने अपने सद्यः प्रकाशित पीएचडी शोध ग्रन्थ ‘मेहरुन्निसा परवेज की कहानियाँ : सामाजिक यथार्थ और कथाभाषा’ में लिखा है | मन को अभिभूत कर देने वाला यह संबोधन गुरुकुल परंपरा की याद दिलाता है और शीश स्वतः श्रद्धा और आदर के वशीभूत होकर नत हो जाता है |  

समीक्ष्य काव्य संग्रह “सुनो तो सही” में कुल 22 कविताएँ हैं जो जन और जीवन के नब्ज को टटोलने के क्रम में सहसा ही यथार्थ को उघाड़ने का उद्यम कर जाती हैं | अपने इस स्वाभाविक प्रयास में कवयित्री के शब्द युगहित में आवश्यक परिवर्तन की ओर इशारा करते हुए हृदय की भीतरी तह को छूकर, आँखों में सफलता के बाद का थिरता जल और बृहत्तर परिवर्तन की चाह से जुड़ी आशा की मीठी मुस्कान लाने वाले बन गए हैं | द्रष्टव्य है परिवर्तन-कामी स्त्रियों की दृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा निर्णीत एक परिवर्तन, कवयित्री के शब्दों में –

“और तय कर लिया है –
लेकर रहेंगी अपने हिस्से का आकाश ;
भरेंगी ऊँची उड़ान ,
नापेंगी सातों समंदर
और साबित करेंगी  –
हम सिर्फ आँगन लीपने
और
झोलों में बंद करने की चीज नहीं हैं
हम बेटियाँ हैं ! हम स्त्रियाँ हैं !!”  (बेटियाँ हैं हम, पृ.30)

सशक्त और मुस्कुराती स्त्री की अंतरात्मा की न दिखाई देनेवाली कलप को भी कवयित्री ने पूरे मनोयोग से न सिर्फ उकेरा है वरन जमीनी विकल्प भी दिया है | आधुनिक समाज में विचारों और भावनाओं का यह उत्तर पक्ष ही है कि अपने वजूद को भूलकर और अपने जड़ों से कटकर जीने की नसीहत देने की पूर्ववर्ती परंपरा से अलग हटकर माँ के रूप में स्त्री अपनी सशक्तता जताते हुए कहती है –
“मैं खड़ी हूँ – अपनी बेटी के साथ;
मैं उसका कल हूँ;
और मैं खुद को जलाने की इजाजत नहीं दूँगी !!” (बेटी की विदाई,  पृ. 28)
यह सशक्तता हर जगह या तो सधती नहीं या फिर वातावरण पर हावी हो जाती है दूषित मानसिकता,  तभी भ्रूणहत्या-सा जघन्य अपराध समाज में निरंतर आश्रय पाए हुए है | अपनी मृत्यु की प्रक्रिया के हर चरण को देखती अवाक् अजन्मी बच्चियों का अपनी माँ से किया जाने वाला यह प्रश्न यहाँ द्रष्टव्य है –

“जन्म से पहले क्यों पढ़े जा रहे हैं मृत्यु के मंत्र ?
क्यों मिलाया जा रहा है तुम्हारे गर्भजल में जानलेवा जहर ?” (गर्भ प्रश्न, पृ.22)

भ्रूणहत्या सहित कई ऐसे मुद्दों को कवयित्री ने उठाया है जो ज्वलंत होने के साथ-साथ मर्मस्पर्शी भी हैं और हृदयविदारक भी | इसी क्रम में प्रस्तुत है भारत से निर्यात की जानेवाली मूंगफली को छीलती भारतीय मजदूर औरतों का एक शब्दचित्र द्रष्टव्य है –
“और छिल जाते हैं उनके होंठ
इस तरह कि –
जुड़ नहीं पाते
एक प्याली चाय पीने की खातिर भी कभी !” (मूंगफली के दाने, पृ.6)

सियासती विद्वेष से उत्पन्न रूह कंपा देने वाली परिस्थिति (प्रजा का हालचाल, पृ.7), सहनशील धरती को रुलाते आदमी की विकास यात्रा के उल्टे कदम (धरती रोती है पृ.13-14), दंगे और दहशत के माहौल में परिवारजनों का सशंकित - भयभीत मन और सारी भयावहता के बीच बचते-बचाते घर लौटी महिला की मनःस्थितियों के चित्रण के साथ ही इस संग्रह की कविताएँ कहीं पीढ़ी अंतराल के जरिए गणतंत्र दिवस के बदलते मायनों से जूझती नजर आती हैं  तो कहीं आत्मीयता के खोल में छिपी दरिंदगी की लगातार जीत से झेंपे हुए मुँह बाए इंसानों से सामना करा जाती हैं | इस प्रक्रम में सामने आता है न्याय व्यवस्था के नैयायिक निर्णय का सच | समीक्ष्य काव्य संग्रह की ‘स्त्री हूँ’, ‘वक्त की बिल्ली’, ‘छाया सीता’, ‘जय हिंद’, ‘मन’ और ‘प्रार्थना’ शीर्षक कविताएँ भी अपने आप में विशिष्ट हैं | साहित्य और समाज के सामयिक यथार्थ को परिलक्षित करती ‘यह समय’ शीर्षक एक त्रिपदी भी इस संग्रह में शामिल  है |

 ‘वसंत आ गया’ शीर्षक कविता में जहाँ महानगरीय जीवन में प्राकृतिक सामीप्य के घोर अभाव की अरुचिपूर्ण स्थिति में कवयित्री द्वारा मुट्ठी भर वसंत को अपने गाँवों की अमराई से भर लाने की चाहत अभिव्यक्त हो रही है वहीँ एक अन्य कविता में वे वर्तमान प्रगतिशीलता की दिशाहीन आपाधापी के बीच ‘प्यार का पथ’ खोजने को उद्दत हैं, द्रष्टव्य है -
 
‘किसी को परवाह नहीं –
न धर्म की, न शर्म की .
बस दौड़े जा रहे हैं सब –’
पुनः देखें -
‘हर रास्ता
ले जाता है बाजार तक .
वह रास्ता कहाँ है
जो ले जाए प्यार तक ?’ (रास्ते, पृ.8)

काव्य संग्रह ‘सुनो तो सही’ की कविताओं में मानवीय संवेदनाएँ अपने अंधतामुक्त  स्वरूप में उपस्थित हैं | अपनी कविताओं में कवयित्री ने मानवीय संवेदनाओं की प्रभावपूर्ण अभिव्यंजना हेतु साहित्यिक प्रतीकों के साथ- साथ इतिहास, दर्शन, लोक और मिथक के संदर्भों का भी यथायोग्य प्रयोग किया है | सामयिकता से लबरेज इन कविताओं को कल्पनाओं से कोई परहेज नहीं है | संग्रह की अधिकांश कविताओं में स्त्री की गरिमा के पक्ष में स्त्री-स्वर प्रबल है | स्त्री पक्ष की प्रबलता से अन्य पक्षों का अस्तित्व कहीं भी बाधित नहीं हो रहा है | हिंदी साहित्य-संसार में कवयित्री डॉ. पूर्णिमा शर्मा का यह सराहनीय अवदान साहित्यिकों की बौद्धिक भूख की शांति एवं सामाजिकों की बौद्धिक जागृति का निमित्त होने के साथ ही सामान्य पाठकों और सामान्य वर्ग के लिए उनके अपने जिए जाने वाले और बहुधा नकार दिए जाने वाले सत्यों से साक्षात्कार है |

समीक्षित कृति : सुनो तो सही / कवयित्री : डॉ. पूर्णिमा शर्मा / संस्करण : प्रथम (2017) / प्रकाशन : किंडल (अमेजन)  / मूल्य : 100 रुपए / पृष्ठ : 33             




















अनामिका के साहित्य में वृद्धावस्था विमर्श


अनामिका के साहित्य में वृद्धावस्था विमर्श
  
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवाणि गृहणति नरोपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानी देहि ||22||

मृत्यु के आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करता यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में है | यहाँ बताया गया है कि जैसे हम पुराने वस्त्रों का त्याग कर नए वस्त्र धारण करते हैं वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है | अनामिका ने अपने साहित्य में इस आध्यात्मिक सत्य के मर्म को वृद्धावस्था की आहत मनः स्थिति से जोड़ने की चेष्टा की है |

वृद्धावस्था माने जीर्ण-शीर्ण शरीर जिसे बदलने के लिए आतुर आत्मा मृत्यु का वरण करती है और नया शरीर धारण करती है | वास्तव में तो वृद्धावस्था इंसानों की आत्मा को ही जीर्ण बना देती है, उसे तार-तार कर देती है और कुछ बदलने का स्कोप भी नहीं छोडती | अपने रचे संसार में अपनी अवहेलना देखने को अभ्यस्त ये वृद्ध अपने चौथेपन में अपनों के लिए आदमी कम और उपयोगी अधिक हो जाते हैं | घर में वृद्धा स्त्री की उपयोगिता को लक्षित करते द्रष्टव्य हैं ‘अनामिका’ के शब्द :

“जो घर में हो कोई वृद्धा –
खाना ज्यादा अच्छा पकता है ,
पर्दे-पेटीकोट और पायजामे भी दर्जी और रफूगरों के
मोहताज नहीं रहते
रहती हैं वृद्धाएँ, घर में रहती हैं
लेकिन ऐसे जैसे अपने होने की खातिर हों क्षमाप्रार्थी
लोगों के आते ही बैठक से उठ जातीं,
छुप-छुपकर रहती हैं छाया-सी, माया-सी |”1

इन बूढी मांस-अस्थियों के ढांचे के नसीब में होता है-घर का एक निर्धारित कोना जहाँ सारे घरेलू कामों को निपटाना इनकी अनचाही पर अनिवार्य जिम्मेदारी हैI ऐसे में ये लहूलुहान हृदय और पथराई आँखें किन्हें भला कहेंगी !

“उन्हें सबसे अच्छे लगते हैं वे लोग
जो पास नहीं आते और कभी जान नहीं पाते
 कि छाले हैं छालों के भीतर I”2

आधुनिक जीवन शैली की व्यस्तता ने ममता और आशीष को महसूस करने की मानव के भीतर की क्षमता को कहीं गुमा दिया है तभी तो आवेगवश स्नेह – आलोड़न उमड़ता है और तुरंत निरस्त भी हो जाता है | इसकी चपेट में नन्हा बचपन भी आ चुका है | दादा-दादी, नाना-नानी के साथ बिताने के लिए उनके पास भी समयाभाव है | स्वयं को अद्यतन रखने के चक्कर में कुछ बहुत महत्वपूर्ण पीछे छूट रहा है | समाज में बचपन और बुढ़ापे का यह बदलता समीकरण यहाँ द्रष्टव्य है -“बच्चों को स्कूल-ट्यूशन-टीटी-कोचिंग और गिटार-क्लास के अभंग सिलसिले से जो कभी फुर्सत भी मिलती तो कंप्यूटर दादी या फोन दादा की गोद उन्हें अधिक विस्तृत और आरामदेह दीखती क्योंकि वहाँ न उपदेशों का च्यवनप्राश था न कोई और रोना-गाना !... वह एक सार्वजनिक खटिया जो गलियों में किसी घर के आगे यों ही पड़ी रहती थी – वृद्धों और बच्चों का फेफड़ा ही मानिए उसको – एक बड़ा ब्रीदिंग स्पेस !”3 सामूहिक ब्रीदिंग स्पेस की निःस्वार्थ परिकल्पना आज की तारीख में एक्सपायर कही जाएगी | 
ग्रामीण परिवेश के आदी वृद्धजनों के लिए महानगरीय जीवन माने कंक्रीट का वह जंगल जहाँ साँस लेने के लिए हवा भी शुद्ध न मिले तो शुद्ध मन के मिलने की बात तो बहुत दूर की हुई | घर के भीतर भी कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप में पुत्र-पुत्रवधुओं  द्वारा निर्गत विधि-निषेध की सैंकड़ों हिदायतें - अंतरात्मा को रुलाने के लिए एकदम पर्याप्त ! इस मामले में वृद्ध पुरुषों को थोड़ी राहत जरुर रहती है पर वृद्धा स्त्री की मनोदशा... , द्रष्टव्य है – “ऐसी महीन मार मारी जाती कि तिलमिला जाते दोनों ....सीनियर कक्कड़ तो बाहर हो भी आते – मुहल्ले के बुजुर्गों में दो-एक बचे हुए थे, उनके साथ शतरंज खेल आते, पर सास तो तरस जाती कि स्नेह-सहानुभूति के दो बोल भी कोई उनसे बोल जाए |”4 लिंग भेद की गृह राजनीति मानो स्त्री जीवन की सनातन साथी ही हो जो जन्म के पहले से मृत्युपर्यंत परछाई सी संग लगी रहती है | “...यह पारिवारिक मापदंड कितना असहनीय है – “ ‘राम, पाठशाला जा !/ राधा, खाना पका !/ राम, आ बताशा खा !/ राधा, झाड़ू लगा !” ( बेजगह ,पृ. 11)| ...‘दुलारू राम‘ जब ‘कमाऊ राम’ बन जाते हैं तब इनके फुर्सत के दो पल भी इनके वृद्ध अभिभावकों को मुश्किल से नसीब होते हैं I”5 तिनका तिनके पास उपन्यास की पात्र अवंतिका अपनी सास का सम्मान करने के साथ अपने जीवन में उनकी अहमियत का उन्हें अहसास भी कराती हैं | अपने इस कार्य में अपने पुत्र डॉ. स्पंदन का योगदान उन्हें सहज ही प्राप्त हो जाता है | डॉ. स्पंदन का अपनी दादी के प्रति यह रुझान सन 38-39 की उस घटना की याद दिलाता है जब नेहरु जी आबिदा के घर ठहरे थे | तब उन्होंने अपनी व्यस्तता के बावजूद बीमार नानीजान को इतना प्यार दिया और इतना ख्याल रखा की वे उनमें अपने बेटे को देखने लगीं थीं | “...बिल्ली भी मात हो जाये – इतने धीमेपन से सोने की तयारी की और यह सब इसलिए की मेरी बीमार नानी जाग न जाये |”6  आज के यांत्रिक दौर में वृद्धावस्था में सारी सुख सुविधाओं के मिलने के बाद भी भावनात्मक अभाव बना ही रहता है | इस अभाव की कमी प्री रिकार्डेड संदेश सुनने से थोड़े न दूर होगी जैसा कि उपन्यास तिनका तिनके पास में अवंतिका की माँ करती हैं | उनकी आँखों में झलकता अकेलापन और बीते हुए पलों के तैरते अक्स को तारा ने भांप ही लिया |
सब कुछ बहुत तेजी से परिवर्तित हो रहा है | शीश पर वृद्ध का हाथ होना कभी सौभाग्यसूचक माना जाता था पर आज उनकी उपस्थिति जीवन पर अनचाहा बोझ है | “माँ-बाप माने क्या – एक बूढा फर्नीचर, तीन टांग की कुर्सी, ....गृहकलह से बड़े लोग बचकर चलते हैं, माँ-बाप को ही समझाए रखते हैं कि बुढ़ापे में देवता होकर रहना चाहिए |”7 देवता के साक्षात् स्वरूप को देवता होने की नसीहत देते योग्य बुद्धिजीवियों की खोखली योग्यता के समक्ष अनामिका की कविता ‘पत्ता-पत्ता ,बूटा –बूटा’ की  इस छोटी बच्ची की मासूमियत कितनी ऊँची लगती है जो अपनी माँ से कहती है –

“माँ, तुम बूढी मत हो जाना कभी !
...क्या पता –मैं कभी स्कूल में होउँ
और मच जाए भगदड़
तो कौन तुमको बचाएगा ?”

 जीवन के अंतिम चरण में भरेपूरे परिवार के मध्य अकेलेपन का दंश झेलती पीढ़ी की पीड़ा की अनुभूति से अभिभूत छोटी बच्ची का निम्न कथन यह संदेश देता प्रतीत हो रहा है कि “बेटियों के साथ माँ-बाप अधिक सुरक्षित हैं |”8   अनामिका मानती हैं कि लड़कों ने “अभिभावकों को अपने पास रखने का मौका गँवा दिया है - चांस  एक्जास्ट कर दिया है ....एक मौका लडकियों को दीजिये ...इससे भ्रूण हत्यायों में भी कमी होगी |”9 इसके पीछे वे इमोशनल कोशेंट का तर्क देती हैं | बेटियों को मिले अभिभावक के लालन-पालन की जिम्मेदारी, संपत्ति में कानूनन हक तो उन्हें मिल ही गया है | यहाँ एक प्रश्न उठता है कि बेटी जैसी पुत्रवधू के आशियाने में वृद्धावस्था बेहाल क्यों है ? पुत्रवधू और सास-ससुर के बीच बेटी और माँ-बाप वाला समीकरण हर बार क्यों नहीं बनता है ? जहाँ यह समीकरण बन जाता है वहां जिंदगी कितनी खुशहाल होती है ! वह सुराख़ कैसे बन गई जिससे हमारा इमोशनल कोशेंट बहा जा रहा है ? ‘पुत्री पवित्र किये कुल दोउ’ और ‘वधू लरिकन्ही पर घर आई | राखेहु नयन पुतरी की नाई ||’ - वाली उक्तियाँ समाज में चरितार्थता नहीं पा रहीं हैं |

उपन्यास की पात्र शीरीन जब पहली पोस्टिंग पर बिहार गयी तब उसने वहां देखा, “पतोहू से खाना माँगा तो वह तिनकी बच्चों को जुड़ नहीं रहा और इनका ही पेट पहाड़ हुआ है |” बूढी ने भूखे ही पेट बीड़ी सुलगायी, खुरपी उठायी और चल दी कि कहीं तो जाना चाहिए |...कुछ देर ही बाद जब लुढ़की तो जीवन की बीड़ी बुझ चुकी थी, पर हाथ की बीड़ी सुलगी हुयी थी ...|”10 अपनी माटी पर प्राण त्यागने का सुख उनकी आत्मा को अवश्य मिला पर जो वृद्ध अपनी जमीन से दूर, सुविधा की आस में शहर आ जाते हैं, वे तो अपमान का कडुवा घूँट पी, तिल-तिल मरते हैं | अपने ही अंश के शीशमहल में अकेलेपन से उकताए और संवाद के लिए व्याकुल ये वृद्ध धीरे-धीरे एक नए परिवार का पुनः सृजन कर लेते हैं | उनका यह नया परिवार भाव-संबंध पर आधारित होता है | इस परिवार की सदस्यता पाते हैं - कबाड़ी वाले, सब्जी वाले, दूध वाले, कुछ पड़ोसी और हर वह इंसान जिसके मन में वृद्धों के लिए आत्मीयता भरा स्नेह और सम्मान है | द्रष्टव्य है, “ वे तो जैसे गूँगी ही हो चलीं ... फिर धीरे-धीरे सब्जी वाले, दूध वाले, कबाड़ी और दो-एक पड़ोसी/ पड़ोसिनों के साथ उनका जो छिटपुट संवाद शुरू हुआ, उसमें नए तरह के संबंध विस्तार को अच्छी-खासी गुंजाइश होने लगी |”11 सृष्टि का सृजनहार भी वृद्धों के इस नए आत्मीय संसार में नन्हे बच्चे के रूप में शामिल है | उपन्यास की भगवंती बुआ को तेज भूख लगी ऊपर से प्रसाद की थाली गिर गई | अब वह कटकटाकर अपने लड्डू-गोपाल की ओर दौड़ीं और “दांत पीसकर बोली-अब का खैब , ओ मुँहझौंसो |”12 सामान्यतः डपटने की परंपरा का स्थान अब ख़ामोशी ने ले लिया है | कुछ कहने से बेहतर है अपना ही मन मार लेना – यह सोच हर जगह कायम नहीं है | अपने बच्चे से अपनेपन की उम्मीद खोकर भी आत्मीय भाव से जुड़े लोगो से प्यार पाने की ललक उनमें शेष रहती है | एक वृद्धा अपने बेटों के पास से भागकर इन्नर बबुआ के घर आ जाती है क्योंकि बचपन में अपने ही हाथो से इन्होंने बबुआ की मालिश की थी | यात्रा में टीटी ने टोका तो उसे डपट भी दिया, “वृद्धा की अकबक तो झूले की रसरी है – एक बार बंधा तो फँसा – झूलते रहो आगे – पीछे बचवा बनकर, बिसर चलो सब काम-काज !”13
जिस बच्चे की मुस्कान की खातिर अभिभावक जीवन भर कष्ट उठाते हैं वही बच्चे बड़े होकर उनके लिए मुस्कान लाने की कोशिश करना तो दूर अपने जीवन में उनकी अहमियत को भी रेखांकित नहीं करना चाहते हैं ! यही जीवन है | भगवंती बुआ ने भी बहुत मनुहार से पाला था अपने बच्चों को किंतु जब बुआ वृद्ध हुई तो उन्हें अपने बच्चों से उतना अपनापन महसूस नहीं हुआ | उन्होंने ठान लिया अहसान और पराएपन का एक निवाला भी अपने हलक में न उतरेंगी | शहर आकर उन्होंने सब्जी का एक छोटा व्यापार शुरू किया | वहां दिलखुश कबाड़ी वाले का परिवार उनकी हर मनावन करने को तैयार रहता था | एक दिन उसने डरते-डरते बुआ से मच्छी खाने के लिए पूछा | सामने तो वे कुछ न बोलीं पर बाद में चख आयीं फिर मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ भी कर लिया | आज से जुड़ने के लिए वृद्ध पूर्वाग्रह को तोड़ कर उन्मुक्तता से जीना चाह रहे हैं | “जब से घर छूटा था, परलोक का डर भी मन से निकल ही गया था ! ...इतने बरस नियम अगोरे, उससे क्या हो गया | कितना सुख काटा | जरा लाँघकर भी तो देखें | पूरे मुह्हले का आसरा था उनका रोबीला बतरस |”14 अपने बच्चों ने परवाह नहीं की तो क्या पूरा  मुहल्ला ही उनके आँचल के छाँव में आने को आकुल है | यह है वृद्धावस्था की विराटता !
उम्र के किसी मोड़ पर दो प्रतिद्वंदी रही स्त्री भी उम्र के इस पड़ाव में आपसी कड़वाहट भूलकर मिठास ही घोलना चाहती है | “श्रीमती बोस को भी इस उम्र में ढेलाबाई रास्ते का रोड़ा नहीं दिखी | ... एक छोटी बच्ची पाल देने का जिम्मा उन्होंने सहर्ष ले लिया !”15 वृद्धावस्था स्वांतःसुखाय को बहुत दूर छोड़ देता है तथा बहुजन हिताय के तर्ज पर अपनों से प्रताड़ित वृद्ध वसुधैव कुटुंबकम की कल्पना को साकार करते नजर आते हैं |

  संदर्भ सूची :


1.       अनामिका (2011), वृद्धाएँ धरती का नमक हैं, कवि ने कहा, दिल्ली : किताबघर प्रकाशन, पृ.24-25
2.        वही, वृद्धाएँ, वही, पृ.82
3.       अनामिका (2008), तिनका तिनके पास, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ.148, 149
4.       वही, पृ.148 
5.       साहित्य और संस्कृति, हमें कायदे से पढ़ो एक एक अक्षर chandanhindi.blogspot.com
6.       अनामिका (2008), तिनका तिनके पास, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ 199
7.       वही, पृ.85
8.       साहित्य और संस्कृति, हमें कायदे से पढ़ो एक एक अक्षर chandanhindi.blogspot.com
9.       अनामिका (2008), तिनका तिनके पास, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ.298
10.   वही, पृ.27
11.   वही, पृ.76
12.   वही, पृ.285
13.   वही, पृ.285
14.   वही, पृ286
15.   वही, पृ.249


मंगलवार, 30 जनवरी 2018



हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
                                                     
आउटलुक पाठक साहित्य सर्वे 2011 के अनुसार ‘अनामिका’ सबसे प्रिय महिला कवि हैंI ‘कवि ने कहा’ शृंखला - संपादक ‘मदन कश्यप’ इनकी कविताओं में महादेवी वर्मा की घनीभूत पीड़ा एवम् करुणा का विस्तार देखते हैंI कविता के साथ साहित्य की अन्य विधाओं (निबंध,आलोचना,विमर्श,कहानी,उपन्यास ,संस्मरण,अनुवाद) में भी जीवन और जगत से जुड़े मार्मिक भावों की सरल और सहज भाषा में सफल अभिव्यक्ति देती हैं ‘अनामिका’ I
इनकी कृति ‘कवि ने कहा : अनामिका’ (2008) में सिर्फ स्त्री ही नहीं बल्कि परिधि पर खड़े सारे बिंदुओं को समेटने की कोशिश की गई है तथापि केंद्र ‘स्त्री’ हेतु सुरक्षित हैI इस स्त्री में अबलापन नहीं है, एक बिंदास अंदाज है जिससे स्त्री जीवन की कहानी में लगे ‘हाय’ शब्द का अस्तित्व ही डांवाडोल हो गया हैI उसका स्थान ‘हलो’ ने ले लिया है – “अबला जीवन ,हलो, तुम्हारी यही कहानी!/ ‘मुख पर डारे’ छोटी-सी मुस्कान / सुनो सब आनी-बानी!”/ (घूंघट के पट खोल रे, पृ. 70)I
इनकी संवेदनशील दृष्टी में यथार्थ और कल्पना का बेजोड़ संगम है, जो एक ओर हृदयस्पर्शी है तो दूसरी ओर मानवीय चेतना को झकझोरने में सक्षम भीI निर्जीव फर्नीचर का शापित प्रेमी होना एक कल्पना है, किंतु इसके साथ वर्तमान गृहस्थ जीवन में स्त्री – पुरुष के रिश्ते का यथार्थ जुड़ा हैI द्रष्टव्य है –“किसी जनम में मेरे प्रेमी रहे होंगे फर्नीचर,/ कठुआ गए होंगे किसी शाप से ये !/...जब आदमी ये हो जाएँगे,/ मेरा रिश्ता इनसे हो जाएगा क्या /वो ही वाला /जो धूल से झाड़न का ?” (फर्नीचर, पृ. 13)
 बेरुखी और मनस्ताप के इस रिश्ते में मन मार कर जीती स्त्री किस कदर एकांत क्षणों में भी दंभी पुरुष के फ्रस्ट्रेशन का शिकार होती है, देखें- “पाते ही कोना अकेला /दांत पीसकर कोहनी मारना और कहना -/ ‘सारी ये झंझट तुम्हारी उठाई हुई है ,/आफत का परकाला हो तुम ही !’ “ (कुहनियाँ , पृ.64)
 आज पौरुष अगर इसी अर्थ में बाकी है फिर कायरता भली ! माँ का आँगन छूटने के पश्चात् मिलने वाली नाजायज यातनाओं का प्रतिकार करने हेतु नारी शक्ति एवम् मानवीय विचारधारा के पोषक तत्व निरंतर तत्पर हैं I लेकिन उस लैंगिक भेदभावयुक्त व्यवहार का क्या जो घर की छत के नीचे हर पल किया जाता है ! मासूमों की मासूमियत को हरनेवाला यह पारिवारिक मापदंड कितना असहनीय है – “ ‘राम, पाठशाला जा !/ राधा, खाना पका !/ राम, आ बताशा खा !/ राधा, झाड़ू लगा !” ( बेजगह ,पृ. 11)| अहोभाग्य कितना दुलार पा रहे हो राम ! आनेवाले समय में इस दुलार का  
क्या प्रत्युत्तर मिलेगा सबको पता है | ‘दुलारू राम‘ जब ‘कमाऊ राम’ बन जाते हैं तब इनके फुर्सत के दो पल भी इनके वृद्ध अभिभावकों को मुश्किल से नसीब होते हैंI इन बूढी मांस-अस्थियों के ढांचे के नसीब में होता है-घर का एक निर्धारित कोना जहाँ सारे घरेलू कामों को निपटाना इनकी अनचाही पर अनिवार्य जिम्मेदारी हैI ऐसे में ये लहूलुहान हृदय और पथराई आँखें किन्हें भला कहेंगी ! “उन्हें सबसे अच्छे लगते हैं वे लोग / जो पास नहीं आते और कभी जान नहीं पाते/ कि छाले हैं छालों के भीतर ( वृद्धाएँ, पृ.82)I
जीवन के अंतिम चरण में भरेपूरे परिवार के मध्य अकेलेपन का दंश झेलती पीढ़ी की पीड़ा की अनुभूति से अभिभूत छोटी बच्ची का निम्न कथन यह संदेश देता प्रतीत हो रहा है कि बेटियों के साथ माँ-बाप अधिक सुरक्षित हैं  –“माँ, तुम बूढी मत हो जाना कभी !/...क्या पता –मैं कभी स्कूल में होउँ/और मच जाए भगदड़/तो कौन तुमको बचाएगा ?”(पत्ता-पत्ता ,बूटा –बूटा ,पृ-44)
माँ-बेटी के मध्य स्नेह की कड़ी के रेखांकन के पश्चात् अनामिका स्त्री के जीवन में ‘नैहर‘ के महत्व का रेखांकन करने हेतु विशिष्ट विशेषण ‘अगरधत्त अंगराई’ का प्रयोग करती हैंI प्रयुक्त विशेषण में निहित निश्चिंतता असीम सा है और अनिवार्य भी परंतु क्या इसमे स्त्री की पूर्ण सुरक्षा निहित है !  दरिंदगी जहाँ पलक झपकते ही समूची स्त्री काया को निगल जाने को आतुर है वहाँ अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्त्री स्वयं वहन करने में सक्षम है Iऐसी आत्म सक्षम स्त्री को चित्रित करते हुए कवयित्री लिखती हैं-“ वो जोरा-जोरी कि/उफ़,अम्मा, मैंने भी/ लेकिन हथियार नहीं डाले/कि जो बाजरा कूटकर / रोटियाँ खिलाई थीं तुमने-/ मैंने उनकी /सैरियत तो दी-“(केरल की एक लोकधुन पर आधारित,पृ. 66 )
हमेशा कहाँ सध पाती है यह पराक्रमशीलता ! परिणामस्वरूप स्त्रियाँ चकलाघरों की रौनक बन घुटने को विवश हैं I इनकी विवशता की पराकाष्ठा है -‘इस घुटनचक्र के कर्ता-धर्ता-भोक्ता के अमानवीय कुतर्क’ , देखें-“ ‘जिंदगी, इतनी सहजता से जो हो जाती है विवस्त्र/ क्या केवल मेरी हो सकती है?’ ”(चकलाघर की एक दुपहरिया, पृ.105)
इस समाज के जेहन में यह क्यों नहीं कौंधता कि जिंदगी की विवस्त्रता का उत्तरदाई कौन है ? मनुष्यता किसी कोने में बाकी होगी तो यह प्रश्न अवश्य झकझोर देगा हृदय को अन्यथा इस समाज में ‘बुद्ध’ सा बिड़ला कहाँ जिनका हृदय इन आम्रपलियो के लिए सखाभाव से ओतप्रोत हो! द्रष्टव्य है –“पर बुद्ध ने मेरा मान ही रखा / और कहा- ‘रह जाएगी करुणा, रह जाएगी मैत्री,/ बाकी सब ढह जाएगा...’ “ (आम्रपाली,पृ. 88) I स्त्री-पुरुष के मध्य सखाभाव का विस्तार होना स्वस्थ समाज हेतु अनिवार्य हैI इस लक्ष्य की पूर्ति कर सकना बहुत सरल नहीं है कारण कि पुरुषवादी मानसिकता स्त्री-पीड़ा जनित कराह से तृप्त होने का आदी हो चुका है I “और इस पूर्ण रास के साक्षी-तारे /टभ- टभ टभकते हैं भर –रात/ पीठ पर /फफोलों के मानिंद ! (चोटें, पृ.81)I कृति की ‘जुएँ’ एवं ‘चिट्ठी लिखती हुई औरत’ कविताओं में जिस ‘खटराग’ एवं ‘शताब्दियों का संचित ‘ की बात की गई है वह स्त्री की इसी कायिक पीड़ा की मानसिक वेदना का प्रतीक जान पड़ता हैI इन यंत्रणा अधिकारियों को किस दृष्टीकोण से ‘पति’ या ‘पुरुष’ की श्रेणी में रखा जाए? समय सकारात्मक दिशा में बदल रहा है I स्त्रियाँ अपने अस्तित्व को तवज्जो दे रहीं हैं और सामनेवाले से भी उनकी यही अपेक्षा है –“ हम भी इंसान हैं-/ हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर /जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद /नौकरी का पहला  विज्ञापन!/ देखो तो ऐसे /जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है /बहुत दूर जलती हुई आग !(स्त्रियाँ ,पृ. 9-10)I पितृसत्तात्मक रवैयों को दरकिनार करते ही एक अनोखे सुकून का अहसास होता है, इसी क्रम में तुलसी के व्यवहार से खिन्न और आत्मविश्वास से पगी रत्नावली प्रतिज्ञाबद्ध होती हैं –“ अपने झोले में ही !/अब निकलूँगी मैं भी / अपने संधान में अकेली !/आपका झोला हो आपको मुबारक !” (तुलसी का झोला, पृ.77)I आत्मनिर्भर स्त्री की छवि की स्थापना के साथ ही अनामिका ने स्त्री शुचिता के पारंपरिक मिथक को कटघरे में खड़ा किया है I
इन्होंने वात्सल्य,बालमनोभाव, बेरोजगार की मनोदशा, सत्य के श्रेणीगत विभाजन की सत्यता, भूमंडलीकरण के दौर में दूर-दराज से आए बच्चों की अभावजन्य (घर,भाषा,धन का संदर्भ) संघर्षशील जीवनचर्या, शिक्षा-पद्धति, तथा अंग्रेजी-भाषा , जैसे विविध विषयों को समेटते हुए जीवन की सच्चाई को व्यावहारिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया है I ऐसे में अनायास ही उनकी व्यंगात्मक दूरदर्शिता का परिचय मिल जाता है –“ भूखे ही ऐंठ रहे लोगों को भी / खाने को मिल जाता है धोखा!” (धोखा,पृ.53)
अनामिका की कविताओं से गुजरना एक खाश भाषाई दुनिया से गुजरने जैसा है जो ठेठ उनकी अपनी है I इस भाषा में जहाँ एक ओर पुराणों और मिथों के संदर्भ हैं, विदेशी साहित्य की अंतर्कथाएँ गुँथी हुई हैं वहीं भारत के गाँव,घर,दलान की सहज शब्दावली का सौंदर्य झिलमिला रहा है I उपर से अभिजात प्रतीत होनेवाली यह भाषा कई बार भीतर से देशी लगती है – एक ऐसा देशीपन जो आज दुर्लभ होता जा रहा है I कुछ शब्द देख लें – चुटपुटिया, दुधमुहाँ, इत्ती-सी, बोरसी, लव-कुश, ईसामसीह, अंचरा, चकर-पकर , काढकर, कुहनियाना, बुद्ध, आम्रपाली, भुरभुरा, राकस, दुधार, बिसात, द्रौपदी की साड़ी,सीता,कठुआ इत्यादिI एक और खाशियत इनकी कविताओं में हमारा ध्यान खींचती है –वह है स्त्री की काया भाषा का मुखर उपयोग Iइन्होंने विभिन्न भावों को प्रकट करने के लिए विविध भंगिमाओं और संकेतों का मनोरम प्रयोग किया है जिससे इनकी कविता की संप्रेषणीयता बढ़ गई है , उदाहरणस्वरूप :

1.       पैंतालीस डिग्री की अंगराई लेती है /क्या-क्या हिसाब बिठाकर ! (बम, पृ.43)

2.       इस अँधियारे कमरे में यों / टीन खुरचती आटे की ? (उड़ान, पृ.94)

3.       क्यों होती हैं उसकी आँखें/ जैसी वे होती हैं-/ तकलीफ की थोड़ी चमक/ और हल्की थर्राहट के बीच (चमक के अलावा, पृ. 121)

4.       गिरकर उठें तो कहें-‘घुटनो, धन्यवाद.../कितना अच्छा है कि/तुम फूटकर भी/फूट नहीं लेते अलग , (रियाज़, पृ.115)

5.       लाल काँच की चूडियों से/ पेंडुलम की तरह लटका/ लगातार डोलता ही रहता था/ एक जंगाया-सा सेफ्टी पिन ! (सेफ्टी पिन, पृ. 97)

6.       जोर से दहाड़ते थे मालिक और एक ही डांट पर/ एकदम पट्ट/लेट जाती थीं वे/दम साधकर, /.../रोज-रोज मरने में /एक बार शरमाती, लेकिन फिर कुछ सोचकर / मर ही जाती , (पतिव्रता, पृ.18)


[समीक्षित कृति – कवि ने कहा : अनामिका / कवयित्री : अनामिका,/ प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली,/ संस्करण :  2008,/ मूल्य : रु.150/- ]

अनामिका के साहित्य में स्त्री













कृष्णभक्त कवियों की रचनाओं में रामकथा

 


कृष्ण भक्तकवियों की रचनाओं में रामकथा 

राम भक्तिकाव्य अपनी समग्रता में मानवता का पर्याय, लोकहित सर्वोपरि का उद्घोषक और सामासिक संस्कृति की अनन्य एकता का प्रतिपादक होने के साथ ही एक महत्तर उद्देश्य का काव्य है | वह महत्तर उद्देश्य है, “मनुष्य होते हुए भी मनुष्यता के अधिकार से वंचित, पशुवत जीवन जीने को बलात प्रस्तुत मनुष्यों में उनके मनुष्य होने के उचित अधिकार बोध को जागृत करना |” राम भक्तिकाव्य की पावन धारा के सतत प्रवाहशील बने रहने का जो उद्यम राम भक्त कवियों ने आरंभ किया , उसमें अपना योगदान देने से कृष्णभक्त कवि भी पीछे नहीं रहे | वाल्मीकि रामायण के आधार पर मर्यादा भाव को सर्वोपरि रखकर इन्होंने अपने रामकाव्य का प्रणयन किया | इस शृंखला के प्रमुख कवि हैं – विद्यापति, मीराबाई, रहीम, हितहरिवंश, सूरदास, नंददास, गोविंदस्वामी, परमानंददास, परशुराम देवाचार्य, माधवदास जगन्नाथी और शेख | इनमें से अधिकांश कवियों ने मुक्तक ही रचे हैं | विद्यापति के रामभक्ति विषयक अधिकांश पद काल प्रवाह में नष्ट हो गए, अब चार पद ही सुरक्षित बचे हैं | इनके पदों में इष्टनिष्ठा, भक्तवत्सलता, लोकरीति, लोकधर्म और क्षेत्र विशेष की परंपरागत मान्यताएँ दृष्टिगोचर होती हैं | सूरदास ने रामकथा से संबंधित 212 पदों की रचना की है | सूरदास के ये पद सूरसागर और सूर सारावली में संग्रहीत हैं | गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा ‘सूर-राम-चरितावली’ के नाम से इन्हें पुस्तकाकार किया गया है साथ ही डॉ. प्रेम नारायण टंडन ने ‘सूर रामायण’ नाम से इनका संपादन भी किया है |
कृष्ण की आराधिका मीराबाई भी अपने ‘मोर मुकुट धारी’ को राम, रमैया, हरि, गोविंदा इत्यादि नामों से अपने पदों में पुकार लेतीं हैं | इस संदर्भ में विद्वानों का मत है कि, “रामसनेही संप्रदाय के गुटकों में मीरा के ‘गिरधर’ अनेक स्थानों पर ‘राम’ और ‘रमैया’ बन गए हैं |”1 मीरा के निम्नलिखित पद से राम और कृष्ण के प्रति उनकी अभेद दृष्टि स्पष्ट है, द्रष्टव्य है –

“मेरे प्रीतम राम कूं, लिख भेजूँ रे पाती |
स्याम सनेसो कबहुँ न दीन्हौ, जानि बूझ गुझबाती |”

मीरा ने क्रमबद्ध रामकथा की रचना नहीं की लेकिन इन्होंने राम, कृष्ण, नृसिंह, वामन इत्यादि  अवतारों को तत्वतः एक माना है | इस आशय का एक पद यहाँ द्रष्टव्य है –

“मन रे परसि हरि के चरण |...
जिन चरण ब्रह्मांड भेट्यो, नख शिखौ श्री भरण ||
जिन चरण प्रभु परसि लीने, तरि गोतम धरण |
जिन चरण कालीहि नाथ्यो, गोप लीला करण ||...
दासि मीरां लाल गिरधर, अगम तारण तरण ||1||”2

लोकरक्षक राम की छाया तले जिस स्वतंत्रता और निश्चिंतता का वरण कोई आतंकित और भयग्रस्त जीव करता है उसका उल्लेख कवि रहीम ने इन शब्दों में किया है –

“गहि सरनागत राम की, भवसागर की नाव |
रहिमन जगत उद्धार कर, और न कछू उपाव ||”3

लोकजीवन में जीवनोद्धार का उपाय राम की शरणागति को मानने वाले रहीम ने अवधी भाषा में ‘बरवै’ की रचना की है | “इस रचना की हस्तलिखित प्रति मेवात से प्राप्त हुई है, जो रहीम के मातामह जमालखां की जमींदारी थी | इसके आरंभ में ‘श्रीरामो जयति अथ खानखाना कृत बरवै आरंभ’ दिया हुआ है | प्रथम छः बरवै में गणेशजी, श्रीकृष्णजी, सूर्य भगवान, महादेवजी, हनुमानजी तथा गुरु की वंदना की गई है | इस प्रति में कुल 101 बरवै हैं... तीन बरवै एक ही स्थान पर राम, नृसिंह तथा कृष्ण के अवतार पर दिए हुए हैं |”4
इस शृंखला में अगला नाम है श्री हितहरिवंश, जिन्होंने राधावल्लभ संप्रदाय  की स्थापना की | नागरी प्रचारिणी सभा के याज्ञिक संग्रह (51/10) में रामभक्ति से संबंधित इनका एक पद संकलित है जिसमें हनुमानजी अशोकवाटिका में माता सीता को सांत्वना दे रहे हैं | हनुमान कह रहे हैं –

“जानकी मैं रघुपति को चेरो |
बीरा दै रघुनाथ पठायो सोध करन को तेरो ||
तेरे कारन स्याम घन सुंदर निकसि कियो बन डेरो |
पदम अठारह दल बानर ले चाहत हैं गढ़ घेरो |
अब जनि सोच करै जिय जननी मानि बचन यक मेरो |
‘हितहरिवंश’ असुरकुल मृग ज्यूँ प्रभुहिं सिंह को चेरौ ||”5

सूरदास ने रामकथा के विहंगम कलेवर को अपने ग्रंथ ‘सूरसागर’ और ‘सूरसारावली’ में समेटा है | यहाँ रामकथा का उसकी समग्रता में रसपान के साथ ही सूर की कुछ मौलिक उद्भावनाएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं | ये  मौलिक उद्भावनाएँ कुलधर्म, लोकधर्म, लोकरीति, लोकपरंपरा तथा लोकविश्वास के साथ गहराई से जुड़ी हुईं हैं | “सूरदास के प्रखर व्यक्तित्व के कारण उन्हें ब्रज-साहित्य का वेदव्यास कहा जा सकता है और उनके सूरसागर को महर्षि वाल्मीकि की रामायण |”6  राम जन्मोत्सव के समय अयोध्या में कैसे समूचा ब्रह्मांड उमड़ पड़ा और इस अवसर पर दान-मान की जो हर्षोल्लास वाली भारतीय रीति है उसका बड़ा हृदयग्राही चित्रण सूरदास ने किया है ! इस संदर्भ में सूर का पद द्रष्टव्य है –

“रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर |
देस-देस तें टीकौ आयौ, रतन-कनक-मनि-हीर ||
घर-घर मंगल होत बधाई, अति पुरबासिनि भीर |
आनंद-मगन भए सब डोलत, कछु न सोध सरीर ||”7

रामभक्ति से संबंधित नंददास के प्राप्त पदों में धनुष यज्ञ प्रसंग, हनुमान द्वारा समुद्र लाँघना, सीता की खोज प्रसंग शामिल है जिन्हें नंददास ग्रंथावली में देखा जा सकता है | इनके कुछ फुटकर पदों में राम-कृष्ण की अभेदता, रामसेतु, केवट और शबरी का प्रसंग भी सांकेतिक रूप में वर्णित है |
 राम जन्म के अवसर पर दशरथ और कौशल्या के हर्षातिरेक तथा रावण वध के पश्चात् देवताओं के उल्लास से संबंधित पद गोविंदस्वामी के पदसंग्रह में संकलित है | राम जन्मोत्सव के समय के हर्ष और उल्लास से संबंधित तीन पद परमानंददास की कृति परमानंदसागर में संकलित है | निंबार्क संप्रदाय के अनुयाई परशुराम देवाचार्य ने निर्गुण रामभक्ति से संबंधित अपनी रचनाओं को ‘वारलीला’ तथा ‘तिथिलीला’ में संग्रहीत किया है | राम की सगुण भक्ति से संबंधित इनके दो ग्रंथ हैं – ‘रघुनाथचरित’ और ‘दशावतारचरित’ | इन्होने कुछ फुटकर पद भी रचे हैं | खोज विवरण 1935-37 में इनका एक पद प्राप्त हुआ है जिसका उल्लेख हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास (भाग-5) पृ. 220 पर किया गया है, द्रष्टव्य है –

“ऐसो राम अकल अविनासी |
ताको दास पडै क्यों फांसी |
हरि दरिया में मुक्ता खेलैं |
राम सुमिरि दुविधा अघ षेलै |
दुविधा पडै सो राम न पावै |
यूँ ही फिरि फिरि जनम गंवावै |
पूरण ब्रह्म एक हरि सोई |
परसराम जानै जन कोई ||”

माधवदास जगन्नाथी जिन्हें नाभादास ने ‘व्यास के जैसा धार्मिक साहित्य का उद्धारक’8 कहा है | रामचरित पर इनकी एक ही कृति मिलती है ‘रघुनाथलीला’ जिसकी एक हस्तलिखित प्रति श्रीकुंज (वृंदावन) में सुरक्षित है | 
कवयित्री शेख की स्वतंत्र कृति उपलब्ध नहीं है | इनकी रचनाएँ कवि आलम की रचनाओं के साथ ‘आलम केलि’ में ही संग्रहीत हैं | इन्होंने अपनी रचना में राम वनगमन के समाचार से व्यथित मातृहृदय का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है जिसका एक अंश यहाँ प्रस्तुत है –

“पसुनि से बैठनि परोसी भये पच्छिन के, झारन के डार बार बार करि रहि है |
सेख भूमि डसि है कि बिस बेलि बसि हैं कि, कुस है कि कांस है कौशल्या काहि क़ाहि है |”9

राम वनगमन के समाचार से सिर्फ माताएँ ही व्यथित नहीं हुईं | यह समाचार पूरे समाज को विकल कर देता है | उस क्षण विकलता का यह रोग समूची प्रकृति में समरूपता से व्याप्त हो गया | शेख ने प्रकृति की व्याकुलता और उदासी का भी मार्मिक चित्रण किया है |
यद्यपि इन मधुरोपासक भक्तकवियों ने रामकाव्य की रचना में सेवक-सेव्य भाव को ही सर्वोपरि रखा है  तथापि भरत का चरित्र यहाँ पूर्ण प्रकाशित नहीं हुआ है | परंतु सूरदास की कविताई ने इस कमी को झाँप लिया है | उन्होंने आवश्यकतानुसार रामप्रेम के मूर्तस्वरूप भरत-चरित्र का भी चित्रण किया है | इस चित्रण के माध्यम से भाई का भाई के प्रति उत्कट स्नेह अभिव्यक्त हो रहा है, द्रष्टव्य है –

“राम जू कहाँ गये री माता ?
सूनो भवन, सिंहासन सूनो, नाहीं दशरथ ताता |
धृग तव जन्म, जियन धृग तेरो, कही कपट मुख बाता |
सेवन राज, नाथ बन पठए, यह कब लिखौ विधाता |
मुख अरविंद देखि हम जीवत, ज्यों चकोर शशि राता |
सूरदास श्री रामचंद्र बिनु कहा अयोध्या नाता |” 10

आज समूची अयोध्या क्या महज एक आने के लिए लोग आपसी वैमनस्य और घृणा को बढ़ावा दे रहे हैं, परस्पर घात कर रहे हैं | धन और मान के समक्ष स्नेह-सूत्र  का कद निरंतर बौना होता जा रहा है | इंसान अपनी मानसिक त्रस्तता से न तो निजात पा रहे हैं और ना ही अपना मन अपनों के समक्ष खोल पा रहे हैं | समाज की इस दारुण परिस्थिति में रामकाव्य ही संजीवनी भी है और सद्गुरु सा पथ प्रदर्शक भी | यह आत्मीयता के उद्बोधन की पराकाष्ठा ही तो है कि रामद्रोह के मूर्तस्वरूप रावण के अंतःकरण में विचरण करती रामनिष्ठा को सूरदास11 और तुलसीदास ने उजागर कर एक प्रत्यक्ष राम वैरी की रामनिष्ठा को उजागर किया है | इस आशय से द्रष्टव्य है ‘रामचरितमानस (अरण्यकांड, दोहा 22)’ का निम्नोद्धृत अंश –

“सुर रंजन भंजन महि भारा | जौ भगवंत लीन्ह अवतारा ||
तौं मैं जाइ बैरु हठि करऊँ | प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ||2||
होइहि भजनु न तामस देहा | मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा ||
जौ नररूप भूपसुत कोऊ | हरिहऊँ नारि जीति रन दोऊ ||3||”

संदर्भ सूची :

1.सिंह, शंभुनाथ. मीरा पदावली पृ. 30
2. चतुर्वेदी, आचार्य परशुराम.  मीराबाई की पदावली
3. बेगम, डॉ. नूरजहाँ.  कृष्णभक्त मुसलमान कवि पृ. 101
4. वही पृ. 88-89
5. उद्धृत हिंदी साहित्य का बृहत  इतिहास (पंचम भाग) पृ. 333
6. संकल्य,  (2010)  डॉ. विद्यारानी, वाग्गेयेकार महाकवि सूरदास, जुलाई-सितंबर, पृ. 32
7. सूरदास, (सं 2065), सूर-राम-चरितावली, गोरखपुर : गीता प्रेस, पद संख्या 2
8. भक्ति सुधास्वादतिलक, पृ. 546
9. बेगम, डॉ. नूरजहाँ.  कृष्णभक्त मुसलमान कवि पृ. 160
10.  सूरदास, (सं 2065), सूर-राम-चरितावली, गोरखपुर : गीता प्रेस, पद संख्या 38
11. वही, पद संख्या 129, 69