मंगलवार, 30 जनवरी 2018

कृष्णभक्त कवियों की रचनाओं में रामकथा

 


कृष्ण भक्तकवियों की रचनाओं में रामकथा 

राम भक्तिकाव्य अपनी समग्रता में मानवता का पर्याय, लोकहित सर्वोपरि का उद्घोषक और सामासिक संस्कृति की अनन्य एकता का प्रतिपादक होने के साथ ही एक महत्तर उद्देश्य का काव्य है | वह महत्तर उद्देश्य है, “मनुष्य होते हुए भी मनुष्यता के अधिकार से वंचित, पशुवत जीवन जीने को बलात प्रस्तुत मनुष्यों में उनके मनुष्य होने के उचित अधिकार बोध को जागृत करना |” राम भक्तिकाव्य की पावन धारा के सतत प्रवाहशील बने रहने का जो उद्यम राम भक्त कवियों ने आरंभ किया , उसमें अपना योगदान देने से कृष्णभक्त कवि भी पीछे नहीं रहे | वाल्मीकि रामायण के आधार पर मर्यादा भाव को सर्वोपरि रखकर इन्होंने अपने रामकाव्य का प्रणयन किया | इस शृंखला के प्रमुख कवि हैं – विद्यापति, मीराबाई, रहीम, हितहरिवंश, सूरदास, नंददास, गोविंदस्वामी, परमानंददास, परशुराम देवाचार्य, माधवदास जगन्नाथी और शेख | इनमें से अधिकांश कवियों ने मुक्तक ही रचे हैं | विद्यापति के रामभक्ति विषयक अधिकांश पद काल प्रवाह में नष्ट हो गए, अब चार पद ही सुरक्षित बचे हैं | इनके पदों में इष्टनिष्ठा, भक्तवत्सलता, लोकरीति, लोकधर्म और क्षेत्र विशेष की परंपरागत मान्यताएँ दृष्टिगोचर होती हैं | सूरदास ने रामकथा से संबंधित 212 पदों की रचना की है | सूरदास के ये पद सूरसागर और सूर सारावली में संग्रहीत हैं | गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा ‘सूर-राम-चरितावली’ के नाम से इन्हें पुस्तकाकार किया गया है साथ ही डॉ. प्रेम नारायण टंडन ने ‘सूर रामायण’ नाम से इनका संपादन भी किया है |
कृष्ण की आराधिका मीराबाई भी अपने ‘मोर मुकुट धारी’ को राम, रमैया, हरि, गोविंदा इत्यादि नामों से अपने पदों में पुकार लेतीं हैं | इस संदर्भ में विद्वानों का मत है कि, “रामसनेही संप्रदाय के गुटकों में मीरा के ‘गिरधर’ अनेक स्थानों पर ‘राम’ और ‘रमैया’ बन गए हैं |”1 मीरा के निम्नलिखित पद से राम और कृष्ण के प्रति उनकी अभेद दृष्टि स्पष्ट है, द्रष्टव्य है –

“मेरे प्रीतम राम कूं, लिख भेजूँ रे पाती |
स्याम सनेसो कबहुँ न दीन्हौ, जानि बूझ गुझबाती |”

मीरा ने क्रमबद्ध रामकथा की रचना नहीं की लेकिन इन्होंने राम, कृष्ण, नृसिंह, वामन इत्यादि  अवतारों को तत्वतः एक माना है | इस आशय का एक पद यहाँ द्रष्टव्य है –

“मन रे परसि हरि के चरण |...
जिन चरण ब्रह्मांड भेट्यो, नख शिखौ श्री भरण ||
जिन चरण प्रभु परसि लीने, तरि गोतम धरण |
जिन चरण कालीहि नाथ्यो, गोप लीला करण ||...
दासि मीरां लाल गिरधर, अगम तारण तरण ||1||”2

लोकरक्षक राम की छाया तले जिस स्वतंत्रता और निश्चिंतता का वरण कोई आतंकित और भयग्रस्त जीव करता है उसका उल्लेख कवि रहीम ने इन शब्दों में किया है –

“गहि सरनागत राम की, भवसागर की नाव |
रहिमन जगत उद्धार कर, और न कछू उपाव ||”3

लोकजीवन में जीवनोद्धार का उपाय राम की शरणागति को मानने वाले रहीम ने अवधी भाषा में ‘बरवै’ की रचना की है | “इस रचना की हस्तलिखित प्रति मेवात से प्राप्त हुई है, जो रहीम के मातामह जमालखां की जमींदारी थी | इसके आरंभ में ‘श्रीरामो जयति अथ खानखाना कृत बरवै आरंभ’ दिया हुआ है | प्रथम छः बरवै में गणेशजी, श्रीकृष्णजी, सूर्य भगवान, महादेवजी, हनुमानजी तथा गुरु की वंदना की गई है | इस प्रति में कुल 101 बरवै हैं... तीन बरवै एक ही स्थान पर राम, नृसिंह तथा कृष्ण के अवतार पर दिए हुए हैं |”4
इस शृंखला में अगला नाम है श्री हितहरिवंश, जिन्होंने राधावल्लभ संप्रदाय  की स्थापना की | नागरी प्रचारिणी सभा के याज्ञिक संग्रह (51/10) में रामभक्ति से संबंधित इनका एक पद संकलित है जिसमें हनुमानजी अशोकवाटिका में माता सीता को सांत्वना दे रहे हैं | हनुमान कह रहे हैं –

“जानकी मैं रघुपति को चेरो |
बीरा दै रघुनाथ पठायो सोध करन को तेरो ||
तेरे कारन स्याम घन सुंदर निकसि कियो बन डेरो |
पदम अठारह दल बानर ले चाहत हैं गढ़ घेरो |
अब जनि सोच करै जिय जननी मानि बचन यक मेरो |
‘हितहरिवंश’ असुरकुल मृग ज्यूँ प्रभुहिं सिंह को चेरौ ||”5

सूरदास ने रामकथा के विहंगम कलेवर को अपने ग्रंथ ‘सूरसागर’ और ‘सूरसारावली’ में समेटा है | यहाँ रामकथा का उसकी समग्रता में रसपान के साथ ही सूर की कुछ मौलिक उद्भावनाएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं | ये  मौलिक उद्भावनाएँ कुलधर्म, लोकधर्म, लोकरीति, लोकपरंपरा तथा लोकविश्वास के साथ गहराई से जुड़ी हुईं हैं | “सूरदास के प्रखर व्यक्तित्व के कारण उन्हें ब्रज-साहित्य का वेदव्यास कहा जा सकता है और उनके सूरसागर को महर्षि वाल्मीकि की रामायण |”राम जन्मोत्सव के समय अयोध्या में कैसे समूचा ब्रह्मांड उमड़ पड़ा और इस अवसर पर दान-मान की जो हर्षोल्लास वाली भारतीय रीति है उसका बड़ा हृदयग्राही चित्रण सूरदास ने किया है ! इस संदर्भ में सूर का पद द्रष्टव्य है –

“रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर |
देस-देस तें टीकौ आयौ, रतन-कनक-मनि-हीर ||
घर-घर मंगल होत बधाई, अति पुरबासिनि भीर |
आनंद-मगन भए सब डोलत, कछु न सोध सरीर ||”7

रामभक्ति से संबंधित नंददास के प्राप्त पदों में धनुष यज्ञ प्रसंग, हनुमान द्वारा समुद्र लाँघना, सीता की खोज प्रसंग शामिल है जिन्हें नंददास ग्रंथावली में देखा जा सकता है | इनके कुछ फुटकर पदों में राम-कृष्ण की अभेदता, रामसेतु, केवट और शबरी का प्रसंग भी सांकेतिक रूप में वर्णित है |
 राम जन्म के अवसर पर दशरथ और कौशल्या के हर्षातिरेक तथा रावण वध के पश्चात् देवताओं के उल्लास से संबंधित पद गोविंदस्वामी के पदसंग्रह में संकलित है | राम जन्मोत्सव के समय के हर्ष और उल्लास से संबंधित तीन पद परमानंददास की कृति परमानंदसागर में संकलित है | निंबार्क संप्रदाय के अनुयाई परशुराम देवाचार्य ने निर्गुण रामभक्ति से संबंधित अपनी रचनाओं को ‘वारलीला’ तथा ‘तिथिलीला’ में संग्रहीत किया है | राम की सगुण भक्ति से संबंधित इनके दो ग्रंथ हैं – ‘रघुनाथचरित’ और ‘दशावतारचरित’ | इन्होने कुछ फुटकर पद भी रचे हैं | खोज विवरण 1935-37 में इनका एक पद प्राप्त हुआ है जिसका उल्लेख हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास (भाग-5) पृ. 220 पर किया गया है, द्रष्टव्य है –

“ऐसो राम अकल अविनासी |
ताको दास पडै क्यों फांसी |
हरि दरिया में मुक्ता खेलैं |
राम सुमिरि दुविधा अघ षेलै |
दुविधा पडै सो राम न पावै |
यूँ ही फिरि फिरि जनम गंवावै |
पूरण ब्रह्म एक हरि सोई |
परसराम जानै जन कोई ||”

माधवदास जगन्नाथी जिन्हें नाभादास ने ‘व्यास के जैसा धार्मिक साहित्य का उद्धारक’8 कहा है | रामचरित पर इनकी एक ही कृति मिलती है ‘रघुनाथलीला’ जिसकी एक हस्तलिखित प्रति श्रीकुंज (वृंदावन) में सुरक्षित है | 
कवयित्री शेख की स्वतंत्र कृति उपलब्ध नहीं है | इनकी रचनाएँ कवि आलम की रचनाओं के साथ ‘आलम केलि’ में ही संग्रहीत हैं | इन्होंने अपनी रचना में राम वनगमन के समाचार से व्यथित मातृहृदय का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है जिसका एक अंश यहाँ प्रस्तुत है –

“पसुनि से बैठनि परोसी भये पच्छिन के, झारन के डार बार बार करि रहि है |
सेख भूमि डसि है कि बिस बेलि बसि हैं कि, कुस है कि कांस है कौशल्या काहि क़ाहि है |”9

राम वनगमन के समाचार से सिर्फ माताएँ ही व्यथित नहीं हुईं | यह समाचार पूरे समाज को विकल कर देता है | उस क्षण विकलता का यह रोग समूची प्रकृति में समरूपता से व्याप्त हो गया | शेख ने प्रकृति की व्याकुलता और उदासी का भी मार्मिक चित्रण किया है |
यद्यपि इन मधुरोपासक भक्तकवियों ने रामकाव्य की रचना में सेवक-सेव्य भाव को ही सर्वोपरि रखा है  तथापि भरत का चरित्र यहाँ पूर्ण प्रकाशित नहीं हुआ है | परंतु सूरदास की कविताई ने इस कमी को झाँप लिया है | उन्होंने आवश्यकतानुसार रामप्रेम के मूर्तस्वरूप भरत-चरित्र का भी चित्रण किया है | इस चित्रण के माध्यम से भाई का भाई के प्रति उत्कट स्नेह अभिव्यक्त हो रहा है, द्रष्टव्य है –

“राम जू कहाँ गये री माता ?
सूनो भवन, सिंहासन सूनो, नाहीं दशरथ ताता |
धृग तव जन्म, जियन धृग तेरो, कही कपट मुख बाता |
सेवन राज, नाथ बन पठए, यह कब लिखौ विधाता |
मुख अरविंद देखि हम जीवत, ज्यों चकोर शशि राता |
सूरदास श्री रामचंद्र बिनु कहा अयोध्या नाता |” 10

आज समूची अयोध्या क्या महज एक आने के लिए लोग आपसी वैमनस्य और घृणा को बढ़ावा दे रहे हैं, परस्पर घात कर रहे हैं | धन और मान के समक्ष स्नेह-सूत्र  का कद निरंतर बौना होता जा रहा है | इंसान अपनी मानसिक त्रस्तता से न तो निजात पा रहे हैं और ना ही अपना मन अपनों के समक्ष खोल पा रहे हैं | समाज की इस दारुण परिस्थिति में रामकाव्य ही संजीवनी भी है और सद्गुरु सा पथ प्रदर्शक भी | यह आत्मीयता के उद्बोधन की पराकाष्ठा ही तो है कि रामद्रोह के मूर्तस्वरूप रावण के अंतःकरण में विचरण करती रामनिष्ठा को सूरदास11 और तुलसीदास ने उजागर कर एक प्रत्यक्ष राम वैरी की रामनिष्ठा को उजागर किया है | इस आशय से द्रष्टव्य है ‘रामचरितमानस (अरण्यकांड, दोहा 22)’ का निम्नोद्धृत अंश –

“सुर रंजन भंजन महि भारा | जौ भगवंत लीन्ह अवतारा ||
तौं मैं जाइ बैरु हठि करऊँ | प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ||2||
होइहि भजनु न तामस देहा | मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा ||
जौ नररूप भूपसुत कोऊ | हरिहऊँ नारि जीति रन दोऊ ||3||”

संदर्भ सूची :

1.सिंह, शंभुनाथ. मीरा पदावली पृ. 30
2. चतुर्वेदी, आचार्य परशुराम.  मीराबाई की पदावली
3. बेगम, डॉ. नूरजहाँ.  कृष्णभक्त मुसलमान कवि पृ. 101
4. वही पृ. 88-89
5. उद्धृत हिंदी साहित्य का बृहत  इतिहास (पंचम भाग) पृ. 333
6. संकल्य,  (2010)  डॉ. विद्यारानी, वाग्गेयेकार महाकवि सूरदास, जुलाई-सितंबर, पृ. 32
7. सूरदास, (सं 2065), सूर-राम-चरितावली, गोरखपुर : गीता प्रेस, पद संख्या 2
8. भक्ति सुधास्वादतिलक, पृ. 546
9. बेगम, डॉ. नूरजहाँ.  कृष्णभक्त मुसलमान कवि पृ. 160
10.  सूरदास, (सं 2065), सूर-राम-चरितावली, गोरखपुर : गीता प्रेस, पद संख्या 38
11. वही, पद संख्या 129, 69

उच्चतर प्रेम का विज्ञान है भक्तियोग

उच्चतर प्रेम का विज्ञान है भक्तियोग


एक आध्यात्मिक विभूति जिनके दिव्य ज्ञान की आभा से भारत भूमि सहित सारी वसुधा आलोकित हो रही है, उन्ही स्वामी विवेकानंद की एक कृति है – “भक्तियोग” | इसके पारायण से मानव समाज कई जटिल पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सकता है | आधुनिकता के मोह-पाश  में फँसे विह्वल सामाजिक प्राणी जो अपने अंतर्मन की शांति हेतु कई प्रयत्न करते हैं | अपने प्रयत्नों के जरिए वे स्वयं के लिए सुख-शांति तलाशते हैं, सच्चे सुख से अनभिज्ञ रहते हुए | उनकी यह दिशाहीन तलाश उनके कीमती वक्त के साथ-ही-साथ उनके उस धन को भी क्षत-विक्षत कर देती है जिसका उपयोग वे बेसहारा और लाचार लोगों के जीवन को सँवारने हेतु कर सकते थे | पर यह ख्याल हममें से कितनों के जेहन में आता है ? जहाँ यह ख्याल होगा, जहाँ इस ओर प्रयत्न होगा – वहाँ अशांति की क्या बिसात ! अचंभा तो तब होता है  जब विराट के प्रतीक की उपासना में लीन मनुष्य सहजता से उसके जीव रूपी साक्षात् स्वरूप की अवहेलना कर बैठता है , इतना ही नहीं वरन अपने से भिन्न पद्धति के उपासकों के प्रति भी असहिष्णु हो जाता है | सच्चे धर्मानुयाई ऐसे तो नहीं होते ! समीक्ष्य कृति में  भक्ति के भिन्न-भिन्न साधनों की पारदर्शी व्याख्या उपलब्ध है | इस व्याख्या का आधार ग्रंथ-ज्ञान के साथ ही स्वामी विवेकानंद की आत्मानुभूति भी है | इस आत्मानुभूति के लेखन का उद्देश्य सर्वानुभूति से जुड़ा हुआ है |   
विराट शक्ति का अस्तित्व स्वीकार करना शोभनीय है | इसे सभी स्वीकार करते हैं | अपनी कृति “भक्तियोग” के माध्यम से “स्वामी विवेकानंद” धर्म के नाम पर पनपती अंधता को मूल समेत उखाड़ फेंकना चाहते हैं | ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति मानव धर्मांधता के कुचक्र में फँसकर अपने अनमोल जीवन को व्यर्थ न कर दे इसलिए स्वामी विवेकानंद अपनी कृति के जरिए अपने बंधुओं की ज्ञान-चक्षु को खोलना चाहते हैं | अतिरेकों की भांति ही अंधेपन में भी विनाश का बीज छिपा है जिसका प्रत्यक्ष साक्ष्य कुरुक्षेत्र का नरसंहार है | मानव चाहे मतांध हो, कामांध हो, धर्मांध हो या किसी अन्य मूढ़ अंधता से ग्रसित हो – मानव की यह अंधता किसी भी दृष्टिकोण से कभी भी सराहनीय नहीं है | ध्यान देने योग्य तथ्य है कि “ वही मनुष्य, जो धर्म और ईश्वर संबंधी अपने आदर्श में इतना अनुरक्त है, किसी दूसरे आदर्श को देखते ही या उस संबंध में कोई बात सुनते ही इतना खूँख्वार क्यों हो उठता है | इस प्रकार का प्रेम कुछ-कुछ दूसरों के हाथ से अपने स्वामी की संपत्ति की रक्षा करनेवाले एक कुत्ते की सहज प्रवृत्ति के समान है | पर हाँ, कुत्ते की वह सहज प्रेरणा मनुष्य की युक्ति से कहीं श्रेष्ठ है, क्योंकि वह कुत्ता कम-से-कम अपने स्वामी को शत्रु समझकर कभी भ्रमित तो नहीं होता – चाहे उसका किसी भी वेश में उसके सामने क्यों न आये |” (स्वामी विवेकानंद, भक्तियोग, पृ. 4)| मानव अपनी विचार शक्ति के कारण ही पशुओं से श्रेष्ठ है पर न जाने क्यों वह आतुरता से विचारहीन कर्मों को अंजाम दे रहा है | मूर्तिपूजा और धार्मिक अनुष्ठानों की लोकप्रियता सर्वविदित है, इस तथ्य को जानते हुए समीक्ष्य कृति में आध्यात्मिक अनुभूति पर विशेष बल दिया गया है | स्वामी विवेकानंद इसे ही प्रत्यक्षानुभूति मानते हैं | यह प्रत्यक्षानुभूति समस्त तर्क-वितर्क एवं संशयों से परे होती है | मानव जीवन में इस अभीष्ट की प्राप्ति हेतु सहज, सरल, निष्पाप आत्मा ही तत्पर हो सकती है | ऐकांतिक साधना के साथ-ही समस्त ब्रह्मांड के लिए  अपने हृदय में अपनत्व संजोने वाला व्यक्ति ही प्रत्यक्षानुभूति का सुयोग्य पात्र हो सकता है | सच्चे गुरु के साथ के अभाव में साधक की सफलता संदेहास्पद अवश्य प्रतीत होती है परंतु यहाँ एक सरलता है – वह यह कि साधक “विराट शक्ति" को ही अपना गुरु मान सकता है | साधक की असीम श्रद्धा के वशीभूत होकर वह विराट शक्ति निःसंदेह उन्हें अपना शिष्यत्व प्रदान करेगी ही | एकलव्य ने भी धनुर्विद्या की प्राप्ति हेतु गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति को अपना गुरु मान कर अभ्यास किया और सफल धनुर्धर बने | यह भी ध्यान रहना चाहिए कि सिर्फ गुरु का वेश धारण कर कोई गुरु के उत्तरदायित्व की पूर्ति नही कर सकता है और न ही शिष्य होने का दंभ भरने से कोई योग्य शिष्य हो जाता है | स्वामी विवेकानंद कहते हैं , “संसार तो ऐसे लोगों से भरा पड़ा है | हर एक आदमी गुरु होना चाहता है | भिखारी भी चाहता है कि वह लाखों का दान कर डाले | जैसे हास्यास्पद ये भिखारी हैं, वैसे ही ये गुरु भी !”(वही, पृ. 24) | आध्यात्मिकता के बीज को अंकुरित कर सकने वाली जमीन और उसके अनुकूल आवोहवा के निर्माण का कार्य इन व्यावसायिक बुद्धि वालों के बूते से कोसों दूर है | समीक्ष्य कृति में स्पष्ट किया गया है कि ऐसे प्राणी अपनी भेद-बुद्धि के साथ वास्तविक धर्म से लगातार दूरी साधे रहते हैं और व्यर्थ ही मंत्रों एवं अवतारों की अवहेलना करने से बाज नही आते | अवतार की मनोवैज्ञानिक सत्यता को स्पष्ट करते हुए लेखक के उद्गार हैं,”मान लो, भैंसों की इच्छा हुई कि भगवान की उपासना करें – तो वे अपने स्वभाव के अनुसार भगवान को एक बड़े भैंसे के रूप में देखेंगे | यदि एक मछली भगवान की उपासना करना चाहे , तो उसे भगवान को एक बड़ी मछली के रूप में सोचना होगा | इसी प्रकार मनुष्य भी भगवान को मनुष्य-रूप में ही देखता है | यह न सोचना कि ये सब विभिन्न धारणाएँ केवल विकृत कल्पनाओं से उत्पन्न हुई हैं | मनुष्य, भैंसा, मछली – ये सब मानो भिन्न-भिन्न बर्तन हैं; ये सब बर्तन अपनी अपनी आकृति और जल धारण-शक्ति के अनुसार ईश्वर रूपी समुद्र के पास अपने को भरने के लिए जाते हैं |” (वही, पृ. 34) |
जिस प्रकार ‘ॐ’ शब्द से ‘विराट शक्ति’ का पूर्ण स्वरूप परिलक्षित होता है उसी प्रकार ईश्वर के वास्तविक स्वरूप (मनुष्य से उच्चतर) की प्रत्यक्षानुभूति हेतु प्राणी को मनुष्य की भावभूमि से ऊपर उठना होगा , श्रीरामकृष्ण की भांति परमहंस बनना होगा | भक्तियोग सभी तरह के ढकोसलों को परे हटाता है | उच्चतम सिद्धावस्था की प्राप्ति हेतु व्यर्थ के पाखंड और कर्मकांड को बढ़ावा देने की तनिक भी आवश्यकता नही है | पराभक्ति की प्राप्ति हेतु गौण भक्ति के साधन रूप में ही धार्मिक अनुष्ठान , प्रतीक-प्रतिमा उपासना , खाद्याखाद्य विचार जैसे बाह्य क्रियाकलाप आवश्यक लगते हैं | ये क्रियाएँ मानव की आंतरिक शुद्धि में सहायक मात्र हैं , इन्हें धर्म का सार भाग नही कहा जा सकता | अविकारी अंतर्मन में ही प्रेमस्वरूप विराट का निवास संभव है | सत्य, त्याग, अहिंसा और दया का भाव ग्रहण करने वाला मनुष्य ही समस्त संसार से प्रेम करने वाला हो सकता है , फिर उसका भोजन कुछ भी हो उसे पतित नही कहा जा सकता ! “...जो थोड़े-से धन के लिए जघन्य से जघन्य कृत्य करने में भी नही हिचकता , वह तो पशु से भी गया – बीता है – फिर चाहे वह घास खाकर ही क्यों न रहता हो | जिसके हृदय में कभी भी किसी के प्रति अनिष्ट विचार तक नही आता , जो अपने बड़े से बड़े शत्रु की भी उन्नति पर आनंद मनाता है वही वास्तव में भक्त है, वही योगी है और वह सबका गुरु है – फिर भले ही वह प्रतिदिन शूकर मांस ही क्यों न खाता हो !” ( वही, पृ. 52) |
आध्यात्मिक अनुभूति जनित अनुराग हृदय की समस्त राग-रागिनियों को विराटोन्मुख कर देता है जिससे सृष्टि के कण-कण में विराट का ही दर्शन होने लगता है , फिर भला प्रेम कैसे न हो ! यही प्रेम विशुद्ध धर्म है | इस प्रेम के कई रूप हैं , जैसे – शांति, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर, परकीया इत्यादी – अपने  हर रूप में यह हमें भयभक्ति के कुसंस्कार से मुक्त करता है | यहाँ प्रेमी भक्त प्रतिदान की आशा से परे होता है वह सिर्फ प्रेम के लिए प्रेम करता है | ऐसे प्रेमोंन्मत्त भक्त जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में कभी भी अपने प्रेमास्पद पर आरोप नही लगातेहैं | उन्हें सहज ही सब स्वीकार्य होता है | “ ऐसे भक्तों को यदि साँप भी काट ले , तो वे कहते हैं, ’मेरे प्रियतम का एक दूत आया था | ऐसे ही पुरुषों को विश्वबंधुत्व की बात करने का अधिकार है |”(वही, पृ.63) |
उच्चतर मानवीय गुणों से संपन्न मनुष्य ही स्वार्थपरता का त्याग कर विश्व बंधुत्व की भावना को बढ़ावा दे सकता है कारण कि आत्मा में स्थित परमात्मा की प्रत्यक्षानुभूति से उसकी देहात्म बुद्धि नष्ट हो जाती है और वह प्रेम की दिव्यता से भर जाता है | यही उच्चतर प्रेम का विज्ञान वस्तुतः भक्तियोग है जिसमें संपूर्ण चराचर जगत ‘विराटमय’ दिखता है | इस पूर्णता को प्राप्त हुए भक्त की दशा स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ,”तब वह पूर्णताप्राप्त भक्त अपने भगवान को मंदिरों और गिरजों में खोजने नहीं जाता ; उसके लिए तो ऐसा कोई स्थान ही नही, जहाँ वे न हों | वह उन्हें मंदिर के भीतर और बाहर सर्वत्र देखता है | साधु की साधुता में और दुष्ट की दुष्टता में भी वह उनके दर्शन करता है; .....वह जानता है कि वे एक सर्वशक्तिमान एवं अनिर्वाण प्रेमज्योति के रूप में उसके हृदय में नित्य दीप्तिमान हैं और सदा से वर्तमान हैं| ”( वही, पृ.85) | समीक्ष्य कृति ‘भक्तियोग’ स्वामी विवेकानंद की मूल अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद है | इस कृति में भावों की प्रस्तुति मूल कृति सी ही है | ईश्वरीय शक्ति और मानव जीवन को भक्ति के माध्यम से जोड़ने वाली यह कृति भक्ति के साधनों से अवगत कराने के क्रम में जीवंत सत्यों से भी साक्षात्कार कराती चलती है |   
समीक्षित कृति : भक्तियोग
लेखक : स्वामी विवेकानंद
अनुवादक : डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल
संस्करण : द्वितीय , 1947
प्रकाशक : स्वामी ब्रह्मस्थानंद, रामकृष्ण मठ, धंतोली, नागपुर – 440012             
मूल्य : 15 रुपये



राम भक्तिकाव्य का अनछुआ मर्मस्थल : रावण चरित




राम भक्तिकाव्य का अनछुआ मर्मस्थल : रावण चरित

  
ऋषि पुलस्त्य और माता केकसी का पुत्र, शिव तांडव स्त्रोत का रचयिता, प्रकांड पंडित, परम शिव भक्त, प्रत्यक्ष रामद्रोह का मूर्त स्वरूप रावण जो अपने अभिमान, हठ, बाहुबल, अनैतिक कार्य, अत्याचार, शौर्य और पराक्रम के लिए पूरे ब्रह्मांड में कुविख्यात है | उसके दंभ और दुराग्रहों की कथा बाँचने अगर वह स्वयं भी बैठ जाए तो भी कुछ न कुछ छूट ही जाएगा | बालकांड में रावण के स्वभाव एवं कृत्यों की ओर संकेत करते हुए तुलसीदास कहते हैं कि जब रावण चलता था तो पृथ्वी भय से कांपने लगती थी तथा उसकी गर्जना सुनने मात्र से देव पत्नियों के गर्भ गिर जाते थे | पूरे विश्व को उसने अपने अधीन कर रखा था | अधीनस्थ समाज की सुंदर (मनुष्य, देव, किन्नर, यक्ष, गंधर्व और नाग) कुमारियों को वह बलात अपने वश में कर लेता था | उसके साम्राज्य में स्त्री के समान ही धर्म की स्थिति भी दयनीय हो गई थी | सारे धर्म कार्य उसकी आज्ञा से विध्वंस कर दिए जाते | जप-तप और यज्ञ में विघ्न डालने में वह स्वयं भी तत्पर रहता था | संसार मर्यादापतित हो गया था, धर्म परायणता नगण्य थी और दिनों-दिन आचार-विचार विनष्ट हो रहे थे | वेद-पुराण कहनेवालों को वह देश निकाला दे देता था | सामाजिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से उसका कोई सरोकार नहीं था | दंभ और मद में चूर हो वह भूल गया था कि “सामाजिक जीवन से सामरस्य, पर व्यक्तिगत जीवन में वरण का स्वातंत्र्य, यही पारमार्थिक विवेक का सही रूप है |”1 एक अधार्मिक के सारे गुणों का भार ढोते रावण का शब्दचित्र, तुलसीदास के शब्दों में, द्रष्टव्य है -
“चलत दशानन डोलती अवनी | गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी ||”2

“भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र |
     मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र ||
देव जच्छ गंधर्ब नर किन्नर नाग कुमारि |
जीति बरीं निज बाहु बल सुंदर बर नारि ||”3

“जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा ||
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा ||
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना ||
              तेहि बहु विधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना ||”4

अधर्म के मार्ग पर दौड़ते हुए इस अधार्मिक चरित्र की विशेषता है कि यह संशय नहीं करता साथ ही दूसरों के संशय न करने के लिए परिस्थिति भी उत्पन्न करता है | मंदोदरी के चिंतित मन और शंकित हृदय को शांत करने की चेष्टा करता रावण, उस क्षण केवल प्रेममूर्ति प्रतीत होता है, देखें –

“अस कहि बिहसि ताहि उर लाई | चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ||
मंदोदरी हृदयं कर चिंता | भयउ कंत पर बिधि बिपरीता ||”5

अपनी प्रत्यक्षदर्शिता और आशावादिता के साथ वह अपना लक्ष्य निश्चित करता है, संकल्प लेता है और उसे पाने के लिए प्रक्रम आरंभ करता है | एक लक्ष्य उसने सीता हरण का ठाना और अपने छल-बल का प्रयोग करते हुए उसे पूरा किया | रावण द्वारा किया गया भार्या हरण का यह अनुचित कार्य क्या केवल शूर्पनखा के अपमान का प्रतिशोध भर था ? इस संदर्भ में रामचरितमानस में उल्लेख है कि खर-दूषण की मृत्यु से रावण सोच में पड़ जाता है | वह सोचता है कि वे दोनों तो मेरे समान ही बलवान थे, उन्हें भगवान के अलावा और कोई नहीं मार सकता है | यदि भगवान पृथ्वी का भार हरण करने के लिए अवतार ले चुके हैं तो मैं भी हठ करके उनसे शत्रुता करूंगा ताकि उनके बाणों के प्रहार से ही मेरे प्राण मेरे शरीर से निकले और मैं भवसागर पार कर पाऊं | अगर वे मनुष्य हैं, किसी राजा के पुत्र हैं तब मैं उन्हें युद्ध में हराकर उनकी नारी को  जीत लूँगा | वह भली-भांति जानता था कि तामस प्रवृत्ति वाले शरीर से भजन संभव नहीं है | इस आशय की पंक्तियाँ निम्नोक्त हैं, देखें -

“सुर नर असुर नाग खग माहीं | मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं ||
खर दूषन मोहि सम बलवंता | तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता ||
सुर रंजन भंजन महि भारा | जौ भगवंत लीन्ह अवतारा ||
तौ मैं बैरु हठ करऊँ | प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ||
होइहि भजनु न तामस देहा | मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा ||
जौ नररूप भूपसुत कोऊ | हरिहऊँ नारि जीति रन दोऊ ||”6

यहाँ अंतःअनुभूतिवाद (INTUTIONISM) की झलक मिलती है जिसके अंतर्गत यह माना जाता है कि अंतःकरण प्रभुत्वसंपन्न होता है और इससे कभी भूल नहीं होती | इस मौलिक अंतःकरण की संपत्ति सार्वभौमिक है | यह अपनी-अपनी सबके पास होती है | रावण ने अपने अंतःकरण की आवाज सुनी और तदनुसार कार्य किया | यह जानते हुए कि उसके इस मत को बहुमत से अनुमोदन तो बहुत दूर की बात है संभवतः एक मत भी उसके खाते में न गिरे | सामान्यतः कोई क्या कहेगा यह सोचकर ही आंतरिक साहस को खो देने की प्रवृत्ति का आम जीवन में हमेशा प्रत्यक्ष होता है पर रावण इस आंतरिक  साहस को नहीं खोता है | उसका यह हरण कार्य जितना निंदनीय है, सकारात्मक कार्यों के संपादन हेतु उसकी यह आंतरिक दृढ़ता उतनी ही प्रशंसनीय और अनुकरणीय है |
रामचरितमानस की पूर्वोद्धृत पंक्तियों से यह तथ्य भी सामने आ रहा है कि रावण का आध्यात्मिक सत्ता में भी विश्वास था | अपने मन में उसने राम की कल्पना जगदाधार के रूप में की | एक परमतत्व पर संपूर्ण विश्व के आश्रित होने की कल्पना प्रायः वस्तुनिष्ठ प्रत्ययवाद के अंतर्गत किया जाता है | रामचरितमानस के लंकाकांड में रावण की मृत्यु न होने से व्याकुल सीता और त्रिजटा के मध्य हो रहे संवाद से यह तथ्य उभरता है कि रावण के हृदय में जानकी विराजमान हैं और जानकी के हृदय में श्रीराम इस तथ्य को स्वयं राम भी जानते हैं | राम जिनके उदर में अनेक संसार बसते हैं वह तो सीता के माध्यम से रावण के हृदयासन पर विराजमान है | इस स्थिति में अगर वे रावण के प्राणों का अंत करते हैं तो ‘रावण हृदयास्थित’ उनके उदर के माध्यम से सारा संसार काल का ग्रास बन जाएगा | इसीलिए वे बार-बार उसके सर और भुजाओं को काट रहे हैं ताकि व्याकुलता में उसका ध्यान सीता से हट कर अपनी रक्षा पर केंद्रित हो जाए | त्रिजटा सीता से कहती है कि उसका हृदयासन शून्य होते ही राम उसका वध कर देंगे | द्रष्टव्य है –

“एहि के हृदयं बस जानकी जानकी उर मम बास है |
मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ||
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटा कहा |
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ||
काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान |
तब रावनहि हृदय महु मरिहहिं रामु सुजान ||”7

रामकाव्य के प्रतिनायक रावण ने सहर्ष युद्ध का वरण किया, उसका शीश उच्चतर मूल्यों के प्रतीक राम के समक्ष भी नत नहीं हुआ | इस नत न होने का प्रत्यक्ष कारण द्रोह प्रतीत होता है परंतु इसके पीछे कुछ और है | रावण के हृदय में राम के प्रति प्रीति और उसकी परलौकिक समझ के अनुसार वैकुंठ में स्थान पाने की लालसा तिस पर तमोगुण प्रधान शरीर की सात्विक कर्म से विमुखता वाली विवशता | इस विवशता ने ही रावण को लोकोत्तर सामूहिक मुक्ति (सामूहिक मोक्ष) की भावना से सीता हरण के लिए प्रेरित किया | युद्ध में राम के हाथों कुल समेत प्राणांत से संपूर्ण कुल का उद्धार हुआ | इस तथ्य का उल्लेख रामचरितमानस में भी है | युद्धोपरांत जब युद्ध भूमि में आकाश से अमृत वर्षा हुई तो सिर्फ रामदल के लोग ही जीवित हुए प्रतिपक्ष से कोई भी पुनर्जीवित नहीं हुआ | कारण कि ‘रामाकार भए तिन्ह के मन छुटि गए भव बंधन’ | राम की शरण में जाकर भी रावण अपना कुल समेत उद्धार कर सकता था | परंतु उसने ऐसा नहीं किया | शिव प्रदत्त शीश को श्रीराम के चरणों में नत कैसे करता वह ! इस धर्म संकट से न उबर पाने की स्थिति में उसने युद्ध का वरण किया | युद्ध के वरण के हश्र से रावण अनभिज्ञ नहीं था | अपने समाज की पारलौकिक मुक्ति हेतु वह परिजनों के प्रत्यक्ष विनाशजन्य असहनीय पीड़ा को पीता रहा | यह है रावण की अलौकिक और अद्वितीय रामनिष्ठा जो प्रत्यक्षतः विनाश का तांडव प्रतीत होता है परंतु वास्तव में यह लोक मंगल का जयघोष ही है | एक तरफ संसार असुरों के आतंक से मुक्त हुआ दूसरी ओर असुर अपने तामसी शरीर से मुक्त होकर सद्गति को प्राप्त हुए | सूरसागर और रामचरितमानस में इस गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करते हुए रावण की पूर्वोद्धृत ‘राम निष्ठा’ को उजागर किया गया है | सूरदास के रामचरित संबंधी सारे पद सूर-रामचरितावली में संकलित है | इसी कृति में मंदोदरी और रावण के परस्पर वार्तालाप के प्रसंग में रावण स्वयं अपने मुख से इस रहस्य में छिपे मार्मिक सत्य को उद्घाटित करते हुए मंदोदरी की ओर मुखातिब होकर कहता है –

“सुनि प्रिय तोहि कथा सुनाऊँ
यह परमोद बसत जिय मैं गति, कत बैकुंठ नसाऊँ ||
अधरम करतहिं गए जन्मसत, अब कैसे सिर नाऊँ |
वह परतीति पैज रघुपति की, सो कैसे वृथा गवाऊँ ||
जौ गुरजन सुनाम नहिं धरते, तौ किति सिंधु बहाऊँ |
मैं पायो सिव को निरमायल, सो कैसे चरन छुवाऊँ ||
जौ सनकादिक श्राप न देते, तौ न कनकपुर आऊँ |
जौ ‘सूरज’ प्रभु त्रिया न हरतौ, क्यौअब अभै पद पाऊँ ||”8 

  सच ही तो है कि सनकादि कुमार अगर उसे श्राप नहीं देते तो उसे इस कनकपुर में आना भी नहीं पड़ता | पूर्वोद्धृत पद में रावण ने नामकरण संस्कार की ओर भी इशारा किया है | वह कहता है कि अगर गुरुजन मेरा ऐसा नाम (रावण) नहीं रखते तो कदाचित मेरा आचरण भिन्न होता | रावण का अर्थ है विश्व को रुलानेवाला | नाम के अनुरूप ही गुण होता है, यह सर्वविदित है पर नाम भी जन्म राशि, नक्षत्र, लग्न, समय इत्यादि के आधार पर ही तय किए जाते हैं | सूर-राम –चरितावली  में ही रावण ने सीता की महिमा स्वीकार की तथा स्वयं को महापापी और राम को तारनहार बताते हुए यह घोषणा करता है कि ‘वह सीता-राम का सेवक’ है –

“जो सीता सत तैं बिचलै, तौ श्रीपति काहि संभारै |
मोसे मुग्ध महापापी कौं, कौन क्रोध करि तारै ||
ये जननी वे प्रभु रघुनंदन, हौं सेवक प्रतिहार |
सीता राम ‘सूर’ संगम बिनु, कौन उतारे पार ? ||”9

समाज की उन्नति और अवनति में प्रत्येक भागीदार होता है | सूक्ति है ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम’ अर्थात श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान पा सकता है | यह ज्ञान ही व्यक्ति को निष्ठावान बनाता है | व्यक्ति की स्व के प्रति निष्ठा यदि निजी अनुभव संसार के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है तो वह समाज के नाश का कारण होती है | रावण की निष्ठा इस संकीर्णताजन्य विनाश का प्रत्यक्ष उदाहरण भी है जो पूरी लंका के विनाश का कारण बना | सोने की लंका जल कर रख हो गई | समूचा समुदाय त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगा | सेनापति के शब्दों में लंकादहन का चित्र, द्रष्टव्य है  –

“रह्यो तेल पी ज्यौ घिय हू कौं पूर भीज्यौ, ऐसौ
लपटयो समूह पट कोटिक पहल कौं |
बेग सौं भ्रमत नभ देखियै बरत पूँछ,
देखियै न राति जैबो महल-महल कौं ||
सेनापति बरनि बखानै मानौं धूमकेतु
उदयौ बिनासी दसकंधर के दल कौं |
सीता को संताप, कि खलीता उतपात कौं, कि
काल को पलीता, प्रलै-काल के अनल कौं || ”10

जो सोच विशाल विनाश का कारण बने उसे साधारणतः निष्ठा का नाम नहीं दिया जाता | परंतु रावण की विद्वत्ता ने उसके मन को पारलौकिक कल्याण में निमग्न कर रखा था | उसकी तामसी वृत्ति उसे सत्कार्य में प्रेरित नहीं कर सकती थी | अतः राम विमुख तन से मुक्ति की रावण की भावना ने उसे राम से वैर लेने की प्रेरणा दी | इसके परिणामस्वरूप रावण को अपनी आँखों के सामने अपने कुल और बंधु-बांधवों का विनाश देखना पड़ा | कोई प्राणी कितना भी दुराचारी क्यों न हो, वह स्वजनों की मृत्यु का कारण कभी नहीं बनना चाहता है | रावण इस असहनीय दुःख को स्वेच्छा से निमंत्रित करता है और भोगता भी है | रावण की व्यक्तिगत आत्मनिष्ठा से उत्पन्न लौकिक विनाश में वस्तुतः समूह का परलौकिक कल्याण (मोक्ष) निहित है | साधारणतया व्यक्तिगत निष्ठा लोकमंगल हेतु धर्म निर्वाह की प्रेरणा देती है | “आत्मनिष्ठा वह तत्व है जो व्यक्ति को अपने आराध्य के निकट पहुँचाती है |”11
रावण की शिव आराधना तो विख्यात है ही, भक्त कवियों ने उसके अंतःस्थित राममयता को भी अपने साहित्य में उद्घाटित कर दिया | सभी तो पंचभूतों की ही निर्मिति हैं परंतु तत्वों की मात्रा सबमें समान नहीं होती है | इसीलिए जिसमें जिस तत्व की प्रधानता होती है वह जीव उस प्रधान तत्व प्रेरित प्रवृत्ति का पोषक बन जाता है | “भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र पुरुषार्थों का मंजुल संतुलन है और उस मंत्र का मूल वाच्य धर्म ही है, क्योंकि उसी से अर्थ, काम और मोक्ष या आत्म कल्याण की साधना की जाती है |”12
 तामसी शरीर में भी धर्म का बीज तत्व निहित रहता है तभी तो क्षण भर के लिए भी धर्म की ओर मन आकृष्ट होता है | पर उसे पाने का मार्ग तो जीव अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप ही चुनता है, जैसे रावण ने चुना | सूर-राम –चरितावली  में ही रावण मंदोदरी से कहता है –

“यह सीता निरभै कौ बोहित, सिंधु सुरूप बिषै कौ पानी ||
मोहि गवन सुरपुर कौं कीबे अपनैं काज कौं मैं हरि आनी ||
‘सूरदास’ स्वामी केवट बिन, क्यौ उतरे रावन अभिमानी ||”13

धर्म को विद्वानों ने आत्म कल्याण और सामुदायिक कल्याण के साथ जोड़कर देखा है | “धर्म उन्नत जीवन की एक महत्वपूर्ण और शाश्वत प्रक्रिया या आचरण-संहिता है जो समष्टि-रूप समाज के व्यष्टि-रूप मानव के आचरणों तथा कर्मों को सुव्यवस्थित कर रमणीय बनाता है तथा उसमें (मानव जीवन में) उत्तरोत्तर विकास लाता हुआ उसे मानवीय अस्तित्व के चरम लक्ष्य तक पहुँचाने के योग्य बनाता है |”14
 राम भक्तिकाव्य में वैयक्तिक आत्मनिष्ठा सामूहिक मुक्ति का आह्वान करती नजर आती है | शबरी, निषाद, हनुमान, सुग्रीव सबकी स्वनिष्ठा राम के प्रति निष्ठा में परिणत होकर लोकमंगल का साधन बन जाती है | राम सबको सहर्ष स्वीकारते हैं, समभाव से स्वीकारते हैं परंतु अपने अधीन कभी नहीं करते | रावण को भी अपने अधीन नहीं किया वह राम से शत्रुता करने के लिए स्वतंत्र था | जीवन की उसकी वह गुप्त अभिलाषा जिससे मंदोदरी भी अनभिज्ञ थी, मृत्योपरांत पूर्ण हुई | रावण ने राम को प्रकट रूप में वैर भाव से और अप्रकट रूप में स्नेह भाव से हर पल अपने चित्त में रखा | आज उसी के शव पर विलाप करती मंदोदरी कहती है, “आपने राम से सदा द्रोह ही किया |” सबके लिए यही सत्य रहा, प्रत्यक्ष जो था ! देखें –   

“जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं |
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ||
आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं |
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ||
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन |
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ||” 15 

कैसा मार्मिक क्षण है !  अर्धांगिनी भी न झाँक सकी उसका अंतर्मन ! रावण छिपाने की कला में भी निष्णात था | कई बार उसने अपने दुःख, भय और शंका को अपनी घोर गर्जना वाली हंसी के पीछे छिपा लिया | समसामयिक रामकाव्य में रावण के चरित्र के उज्जवल पक्ष खुल कर खुल रहे हैं जिससे केंद्रीयता विखंडित हो रही है | नए विचारों का साहित्य-संसार में आगमन हो रहा है जो साहित्यिक जीवंतता की स्वाभाविक आवश्यकता है | रावण जो राम भक्तिकाव्य में हाशिए का भी हाशिया था, “अब रावण ‘परिधि’ को छोड़कर केंद्र में आ रहा है और राम संस्कृति ‘केंद्र’ छोड़कर ‘परिधि’ पर जा रही है |”16 इससे स्पष्ट  है कि विचार और विकास निरंतर गतिमान हैं | भक्तिकाल से उत्तर आधुनिकता की साहित्यिक यात्रा करते हुए राम का चरित्र साहित्य में देवत्व से मनुजत्व की ओर बढ़ता जा रहा है और रावण का चरित्र वैधता और अवैधता से परे होकर मीडिया सहित कहानियों और उपन्यासों में भी, साहित्यिक केंद्र बनता जा रहा है |

    
संदर्भ :
1.       मिश्र, डॉ. विद्यानिवास. (1987), तुलसी मंजरी, दिल्ली : प्रभात प्रकाशन, पृ. 27-28
2.       तुलसीदास, गोस्वामी. रामचरितमानस, गोरखपुर : गीता प्रेस ( दोहा 1-181-3)
3.       वही, ( दोहा 1-182- क,ख)
4.       वही, (दोहा 182 का छंद)
5.       वही, ( दोहा 5/36/1)
6.       वही, ( दोहा 3/22/1-3)
7.       वही, (दोहा 6/दोहा 98 का छंद और 99 का छंद)
8.       सूरदास, (सं० 2065), सूर-राम-चरितावली, गोरखपुर, गीता प्रेस, पद संख्या 129
9.       वही, पद संख्या 69
10.    सेनापति, कवित्त रत्नाकर – 4/38, उद्धृत (2016), राम भक्तिकाव्य में लोकपक्ष, पटना : अंजान प्रकाशन, पृ.162
11.    डॉ. मोहन, (1990), सगुण भक्तिकाव्य में लोकपक्ष, वाराणसी : संजय बुक सेंटर, पृ. 38
12.    तिलक,बाल गंगाधर. (तीसरा प्रकरण) गीता रहस्य, पृ. 67
13.     सूरदास, (सं० 2065), सूर-राम-चरितावली, गोरखपुर, गीता प्रेस, पद संख्या 130
14.    धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, द्वितीय खंड, अध्याय 1, उद्धृत शर्मा, आचार्य देवेंद्रनाथ. कुमार, डॉ. वचनदेव. (1981), तुलसी साहित्य विवेचन और मूल्यांकन, दिल्ली, नेशनल पब्लिशिंग हाउस,पृ 56.
15.    तुलसीदास, गोस्वामी. रामचरितमानस, गोरखपुर, गीता प्रेस (6/ दोहा 103 का छंद, दोहा 104)
16.    पालीवाल, डॉ.कृष्णदत्त. 18-01-2005, उत्तर आधुनिकता के स्त्रीवादी विमर्श का जादू, हिंदुस्तान,


भूमंडलीकरण और देह व्यापार




भूमंडलीकरण और देह व्यापार

(तिनका तिनके पास के विशेष संदर्भ में)


देह व्यापार एक ऐसा अनैतिक व्यापार है जिसमें निरंतर ग्राहकों की रेलमपेल के कारण व्यापार का आप्त वाक्य ‘ग्राहक सर्वोपरि’ निरर्थक लगता है ! इसमें माल की माँग और उसकी उपलब्धता सापेक्ष बढ़ती रहती है तिस पर विडंबना यह है कि इसका व्यवस्थापक जो इस माल की मेहनताना का बड़ा हिस्सा हड़पता है, उसकी पहचान और यौनकर्मियों के ग्राहकों की सूची (नाम-पते) अनुपलब्ध रहती है | बीच की कड़ी है दलाल जो संपर्क सूत्र एवं गार्ड की भूमिका अदा करता है | देह व्यापार के केंद्र में है ‘विवश उत्पीड़ित सनातन स्त्री’ जिन्हें प्राचीन भारत में ‘गणिका’ कहा जाता था | ‘तिनका तिनके पास’ उपन्यास में इन्हें ‘कॉल गर्ल/वेश्या’ कहा गया है | इसका पर्याय है अंग्रेजी का ‘prostitute’ जो लैटिन के ‘prostibula’ से बना है | उपन्यास की केंद्रीय पात्र तारा ने लेक्चरर के रूप में कार्य करते हुए पढ़ा,”वेश्यावृत्ति भी एक तरह का पागलपन है ...बड़े गले का ब्लाऊज या छोटा स्कर्ट पहनना आज भी समस्या है, लोग पहनने वालियों को वेश्या कहते हैं | तो ‘वेश्या’ होना आज भी बुड़ा माना जाता है |”1 वेश्यावृत्ति निवारण कानून 1956 में उल्लेख है, “किसी महिला द्वारा किराया लेकर, चाहे वह पैसे के रूप में लिया गया हो या मूल्यवान वस्तु के रूप में और चाहे फ़ौरन वसूला गया हो या किसी अवधि के बाद, स्वच्छंद यौन-संबंध के लिए किसी पुरुष को अपना शरीर सौंपना ‘वेश्यावृत्ति’ है और ऐसा करनेवाली महिला को ‘वेश्या’ कहा जाएगा |”2 सोचने को बाध्य करती है यह परिभाषा कि क्या स्त्रियाँ ऐसा करना चाहती हैं अथवा येनकेन प्रकारेण उनसे ऐसा करवाया जाता है ? अगर स्त्रियाँ स्वतः उपलब्ध हो रही हैं इस घृणित कार्य के लिए तो फिर मानव तस्करों को तस्करी का अवैध तरीका क्यों ईजाद करना पड़ रहा है ? स्त्रियाँ अगर देह व्यापार करने की इच्छुक हैं तो सारी स्त्रियाँ इसे क्यों नहीं अपनाती ? क्यों गृहस्थिन की भूमिका में रहती हुई स्त्रियाँ इस शब्द से भी भय खाती हैं ? जबकि इस कुचक्र में फंसी भूमंडलीकरण के दौर की स्त्री सामान्य कर्मी की भांति स्वयं को एक यौनकर्मी बताती है, प्रस्तुत है प्रभा खेतान से उसकी बातचीत का एक अंश :
“पहले परिचय में ही उसने कहा – मैं एक यौनकर्मी हूँ |...हो सकता है अगले दो-तीन सालों में मैं अपना पेशा बदल लूँ या फिर इस काम से रिटायर होना चाहूँ |
मगर तुमने यह काम चुना क्यों ?
अपनी इच्छा से, ज्यादा धन कमाने, मेरे अच्छे ग्राहक हैं | वे मेरी कीमत अच्छी आंकते हैं | भला आते हुए धन को मैं क्यों छोड़ने लगी | ...तुम शादी भी धन के लिए करती हो |...मुझे धन चाहिए बहुत अधिक ताकि मैं चैन से बुढ़ापा काट सकूँ |”3
    रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय |/सुनि अठिलैहें लोग सब बाँटी न लैहें कोय || की तर्ज पर     अर्थोपार्जन के इस तरीके का इतना सबल समर्थन यह तो साबित करता है स्त्री व्यर्थ ही अपनी विवशता का रोना नही रोना चाहती | वह सचमुच सबल है और देह विमर्श से सर्वथा मुक्त भी ! वह इस काम को एक सामान्य काम की भांति करती है | क्या अर्थोपार्जन के सारे उद्योगों को छोड़ स्त्री स्वेच्छा से अपनी आत्मा को कलपाने वाला यह रोजगार चुनती है ?  क्या उसके भीतर बसी मानुषी को ऐसे ही जीवन की तलाश थी ? क्या उसे प्रेम और सम्मान नहीं चाहिए ?
अनामिका की कविता ‘चकलाघर की एक दुपहरिया’  की पंक्तियाँ देखें, ”जिंदगी, इतनी सहजता से जो हो / जाती है विवस्त्र / क्या केवल मेरी हो सकती है ?’ उसने कहा और चला गया ! / एक कुंकुम रंग की क्रूरता / पसरी थी अब घर में !” यह पितृसत्ता के नैतिक साहस की सीमा है जिसे वे नहीं लाँघते |
एक तो देह और मन के घटक में तोड़कर स्त्री को देखने  और निरंतर उनके मन को रौंदने की कला में सिद्धहस्त लोगों का जमावड़ा तिस पर भूमंडलीकरण के अंतर्गत वस्तुकरण की प्रवृत्ति – ये स्थितियां देह व्यापार के लिए सोने में सुगंध सी हो जाती हैं | क्षेत्रीय, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई सफेदपोश सेवाएँ भी बहुधा अप्रत्यक्ष रूप से देह व्यापार का मार्ग प्रशस्त करता है | हालाँकि इस स्थिति से निबटने के लिए राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कानून भी हैं | भारतीय अनैतिक व्यापार अधिनियम 1956 की धारा 3(1),(2) के अंतर्गत देह व्यापारगैर क़ानूनी है | इसे करवाने वाले को अपराध सिद्ध होने पर जुर्माने के साथ 2-5 वर्ष की सश्रम सजा का प्रावधान है | धारा 4 (1),(2) के तहत ऐसी कमाई पर जीवन जीने वाले एवं उनके साथ रहने वाले को भी सजा मिलती है | धारा 5(1), 7(1), 7(1ए) और 7(2) के तहत भी अपराधी के लिए सजा का प्रावधान किया गया है | इस कानून में कुछ कमियां पाइ गई जिसे दूर करने के लिए पहली बार सन 1978 में और दुबारा विस्तृत रूप से सन 1986 में सुधार किया गया जिसमें ‘पुरुषों का यौन शोषण’ शब्द भी जुड़ गया | ये सुधार भी अपूर्ण साबित हुए इसलिए अब एक नया बिल लाए जाने की केंद्र सरकार की योजना है जिसके तहत बच्चे की परिभाषा 16 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी जाएगी साथ ही चकलाघर चलानेवालों एवं उसमें सहयोग करनेवालों के लिए सजा भी बढ़ाई जाएगी |
“ ‘पीच’ संस्था अपनी क्लाएंट्स की एच.आइ.वी जाँच करके ही उन्हें फॉरवर्ड करती है ...इसका भी जिम्मा लेती है कि कोई नहीं हो !”4 क़ानूनी दांव-पेच और पुलिसिया लफड़ा का तोड़ निकालने की पूरी गुंजाइश यहाँ मौजूद है |आधुनिकता के शिखर को छूने वाला आदमी आज भी अपनी मानसिकता में ही पिछड़ा हुआ है !
     एक स्त्री हमेशा सच्चा मित्र चाहती है पर उसकी आँचल में बंध जाते हैं देह लोलुप प्रेमी | ये व्यक्ति भी सिर्फ देह लोलुप नहीं होते | ये लोग स्त्री जीवन के विविध पक्षों का आदर अवश्य करते हैं परंतु अपनी विकृत मानसिकता पर इनका वश नहीं चल पाता |  ऐसे लोग समाज के किसी भी वर्ग या श्रेणी के हो सकते हैं, रक्त संबंधी भी हो सकते हैं या कार्यस्थल के कथित साथी या कोई अपरिचित | वस्तुतः एक स्त्री के लिए पुरुष मित्र ही दुर्लभ है | “सर्वतोमुखी प्रेम का दावा ठोंकने वाले देह-लोलुप प्रेमी तो ‘तीन बुलावै तेरह आवै’ की तरह थोक में राह-चलते मिल जाते हैं मगर देह-निरपेक्ष कोई सच्चा दोस्त नहीं मिलता किसी अकेली स्त्री को !”5
यह स्थिति आज अचानक उत्पन्न नहीं हुई है | इसके बीज संस्कृति में ही हैं | ब्रह्मा की सृष्टि में रंभा, मेनका और उर्वशी का होना, प्राचीन नगरों में नगरवधू की उपस्थिति इसका साक्ष्य हैं | यह अलग बात है कि तब आम्रपाली को बुद्ध मिल गए थे और आज स्थिति की भयावहता नियंत्रण से बाहर है | जाने-अनजाने चाहे-अनचाहे जो स्त्रियाँ इसका शिकार हो रहीं हैं वे व्यथित हैं  साथ ही वे भी व्यथित हैं जो घर के दायरे में मुस्काती हैं, सुरक्षित हैं | भला वे क्यों व्यथित हैं ? वे पति, पुत्र, भाई, पिता और मित्र रूपी पुरुष के भटकाव से भयभीत हैं, व्यथित भी पर चुप ! चुप्पी न तो समस्या का समाधान है न ही स्त्री का परंपरागत आदर्श | यह भ्रम है जिसे टूटना चाहिए अन्यथा विद्यापति की सांत्वना से ही काम चलाना पड़ेगा | “... भ्रमर अकेला है और कुसुम बहुत हैं | उसका कौन दोष है ? जातकी, केतकी और नवीना पद्मिनी सबमें उसका समान अनुराग है | उस अवसर पर भी वह तुम्हें नहीं भूलता है, यही तुम्हारा बड़ा भाग्य है, भौंरा एक ही फूल में नहीं रमण करता है और स्वामी एक ही स्त्री के साथ नहीं रहता है |”6
समयानुसार संस्कृति और परंपरा का परिष्करण एक स्वस्थ और जागरूक समाज के लिए नितांत आवश्यक है | सामाजिक और सांस्कृतिक के साथ ही साथ देह व्यापार की आर्थिक पृष्ठभूमि भी है | पूँजी के स्तर पर नवपश्चिमीकरण की उदार अर्थव्यवस्था के तहत समाज में तीन वर्ग हैं – निम्न वर्ग (श्रमिक), मध्यम वर्ग (नौकरीपेशा वाले) और उच्च वर्ग (धनाढ्य पूंजीपति) | इनमें देह व्यापार के अंतर्गत सर्वाधिक शोषण निम्न वर्ग का ही होता है | अपनी सर्वाधिक आर्धिक परेशानी के कारण येन केन प्रकारेण ये देह व्यापार के दलदल में फंस ही जाते हैं | संपूर्ण विश्व में मानव तस्करी का जो जाल फैला हुआ है निर्धन महिलाएं ही उसका अधिकतर शिकार होतीं हैं | आर्थिक स्तर से निम्न समुदाय विवशता में जिस आय के विकल्प को स्वीकारते हैं, मध्यम आर्थिक स्थिति वाले अप्रत्यक्ष रूप से उस व्यापार की मजबूत कड़ी बन जाते हैं,उच्च स्थिति में आने के लिए | कुछ इसी तरह का शुतुरमुर्गी व्यवहार धनाढ्य पूंजीपति भी करते हैं | सामान्य जनता जो इस कुचक्र के चक्कर में अभी नहीं पड़ी है वह भलमानुष की भांति अपना मुँह सीकर रहती है | बहुधा व्यक्तिगत संपर्क कायम करने और व्यापारिक समझौतों की निर्बाध उन्नति के लिए उपहार स्वरूप भी यौनकर्मियों का उपयोग किया जाता है |
 यानि निर्धनता और विवशता की चादर में लिपटी स्त्री का समाज में चौतरफा शोषण होता है | अपना उल्लू सीधा करने के लिए कोई भी अकेले (सबल-निर्बल, स्त्री-पुरुष) या अपने समुदाय के साथ इनका दैहिक, आर्थिक और मानसिक शोषण करता है | हाल में ही एक खबर सामने आई, “तीसरी बार छात्रा को एक वृद्ध के हाथों बेचा गया | छात्रा के विरोध करने पर वृद्ध के भाई से उसकी शादी करा दी गई | बरामद छात्रा की माँ का आरोप है कि प्रिया उर्फ़ रिजवाना क्षेत्र की लडकियों को बेच देह व्यापार के धंधे में लगाने का काम करती है |...जेल भेज दिया |”7 ऐसे खबर अखबारों और न्यूज़ चैनलों में छाए ही रहते हैं |  ‘तिनका तिनके पास’ उपन्यास की केंद्रीय पात्र तारा और उसकी माँ इस आर्थिक दुश्चक्र का शिकार रही | शिक्षा, धन और पारिवारिक परिवेश के अभाव में तारा की माँ ने अपना और अपनी बेटी का पेट पालने तथा उसे सही परवरिश देने के लिए उसी धंधे को को जीवन का पर्याय बना लिया जिसमें वे कभी जबरन ढकेली गई थी | परिस्थितियों की शिकार अपनी माँ के लिए तारा का व्यवस्था के प्रति आक्रोश है कि जब माँ इन दुश्चक्रों से निकलने का प्रयत्न कर रही थी उस समय इस सभ्य समाज का कोई भी भला मानुष साथ देने क्यों नहीं आया ? स्वयं तारा जो पेशेवर कॉल गर्ल बनी उसके पीछे भी आर्थिक स्थितियाँ ही थी | “कितनी अजीब बात है कि ससुराल से जब सीता निकाली गई तो नैहर से भी कोई लिवाने न आया ! ऐसा भी क्या विदेह हो जाना, बाबा ! ऐसे समाज से तो जंगल भला |...तो आज हमारी जिंदगी का नक्शा कितना अलग होता !”8
इस आर्थिक स्थिति की विडंबना की पराकाष्ठा तो तब प्रत्यक्ष होती है जब अपनी असंवेदनशीलता का परिचय देते हुए अभिभावक स्वयं अपनी बच्ची को या इस दलदल में धकेल देते हैं जैसा कि उपन्यास की नन्ही ठुमरी का  बेबुनियाद शक के आधार पर अपने पिता द्वारा बेचा जाना | अन्य की क्या कहें जब स्त्री भी स्त्री को नहीं समझ रही है !

ढेलाबाई शिवालय में अकेले रह रहे महेंदर मिसिर की सेवा तब तक करती रही जब तक उनकी पत्नी उन्हें ले नहीं गई | इस सेवा के प्रतिदानस्वरूप ढेलाबाई को क्या मिला ? उनकी पत्नी ने “जाते-जाते एक बार पलटकर ढेलाबाई को ऐसी निगाहों से देखा जैसी आँखों से देवदत्त ने अपना आहत हंस उठाते हुए सिद्धार्थ को देखा था !”9  इसी उपन्यास में एक ‘पीच संस्था’ का जिक्र है जो देह व्यापार का गढ़ है | इस संस्था के सहयोगी और भी हैं पर इसकी मुख्य संचालिका एक स्त्री है | माने स्त्री भी स्त्रीत्व की कब्र खोद रही है , मातृत्व का मजाक उड़ा रही है और सतीत्व को नष्ट करने में सबल सहयोग कर रही है ! संभव है कभी वह भी इस दुश्चक्र में फंसी हो और अब उसके भीतर की स्त्री शायद मर गई है जो वह यहाँ सहयोग दे रही है या केवल धनाकर्षण ही उसे बहनापा को नष्ट करने की प्रेरणा दे रहा है |
देह व्यापार जैसे घृणित व्यापार में स्त्रियों को न सिर्फ ढकेला जाता है बल्कि वहां टिके रहने के लिए बाध्य भी किया जाता है | कैसा कटु सत्य है इसका कि जीवंत-ज्ञान-बुद्धि संपन्न विक्रय सामग्री की अनिच्छा जानते हुए भी बलपूर्वक उसे बेचा जाता है और क्रेता अपनी अमानुषिक वृत्ति का परिचय देते हुए   ऊँचे दामों पर उसे लपककर खरीदता है | किसी भी व्यापार की सामान्य सी सच्चाई है – क्रेता वर्ग की संतुष्टि एवं उसकी सक्रिय और सक्षम भागीदारी | जाहिर सी बात है कि क्रेता वर्ग अगर बाजार की किसी सामग्री को नकार दे तो व्यापारी उसका व्यापार नहीं कर पाएगा | पर इस व्यापार में सामग्री की माँग कभी घटती ही नहीं, शायद माँग की नित बढ़त की आपूर्ति हेतु रोज नई आपराधिक घटनाओं से अख़बार पटे रहते हैं | किसी की आत्मा का गला घोंटकर अपने घर का चूल्हा जलाने वाली सोच को धिक्कार है | माँ, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका, दोस्त, मार्गदर्शक और खुद को भूलकर न जाने कौन-कौन सी भूमिका निभाती हैं स्त्रियाँ सबके जीवन में ! मानव जीवन में अमृत का संचार करनेवाली इस नारी को भोग- वस्तु समझने वाली मानसिकता पूरे समाज के लिए घातक है | इस मानसिक सरांध को दूर करने की एक कोशिश ‘तिनका तिनके पास’ उपन्यास में  है | ‘जब सनातन स्त्रियाँ ही दोयम दर्जे में रखी जाएं तो फिर तारा जैसी स्त्रियों का क्या !’ – कॉल गर्ल तारा के माध्यम से यह उपन्यास ऐसी सोच को दरकिनार करता है | तारा स्वयं को एक सनातन स्त्री मानती है | वह उन वेश्यागामी पुरुषों पर आक्रोशित होती है जो स्त्री को उसकी औकात याद दिलाते हैं और पूर्ण मनुष्य की जगह महज एक यौनकर्मी मानते हैं | सचमुच वह वेश्यागामी अपनी ओर क्यों नहीं देखता जिसकी वासना की अग्नि में एक स्त्री की इच्छा, आशा, भावना, आत्मा सब होम हो गए | एक  स्नेहमूर्ति के स्नेह तत्व का हनन करनेवाले की अपनी औकात क्या हो सकती है ? बात औकात की नहीं बात है मानव जाति के अस्तित्व और अस्मिता की जिसके लिए यह व्यापार अत्यंत घातक है  | अतः न सिर्फ इसका वरन इसकी सहायक सभी वृत्तियों का अंत होना नितांत आवश्यक है अन्यथा मनुष्यता विनष्ट हो जाएगी |
यौनकर्मी स्त्री को देह-व्यापार के दलदल से निजात दिलाकर सामाजिक मान्यता दिलाने की आवश्यकता है | जीवन दुर्वह भार न बन जाए इसके लिए सामाजिक प्राणी की सामाजिक प्रतिष्ठा तो होनी ही चाहिए | अगर इनकी संतानें हैं तो उन्हें भी शिक्षा, विकास व रोजगार के सभी अवसर उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है | देह व्यापार में ऊँगली भले ही वेश्या की ओर उठती है किंतु यह पितृसत्ता के तुष्टीकरण की नीति के तहत ही तो जीवित है | “पुरुष वर्ग रस्सी से बँधी स्त्री का स्वाद भी पाना चाहता है और रस्सी तुड़ाई                              हुई स्त्री का भी |”10
पितृसत्ता जो स्त्री संवेदनाओं का मर्मज्ञ बना फिरता है क्या वह इस तथ्य को झुठलाकर, इन अमानवीय और असामाजिक कृत्यों को समूल नष्ट करने के लिए कृत संकल्प है ? पूरा समाज जो इस संकल्प की पूर्णता हेतु जी जान से जुट जाए फिर देह-व्यापार के उन्मूलन के साथ इन यौनकर्मियों की समाज में मनुष्योचित मान-प्रतिष्ठा होने से कोई रोक न पाएगा | इसके साथ ही इन्हें रोजगार के अन्य साधन भी उपलब्ध कराए जाएँ | पितृसत्ता जो इनके उपभोग के बदले इनके अर्थाभाव को भरता रहा है अब जबकि स्त्रियों की संवेदना और सम्मान के हक में क़ानूनी कार्यवाही द्वारा इस व्यापार को बंद कर दिया जाएगा, उस स्थिति में  पितृसत्ता के पूँजी का जो हिस्सा पहले चकलाघरों में जाता था अब वह उनकी बचत राशि में ही जुड़ा रहेगा | लघु प्रायश्चित के रूप में वे इसका उपयोग इनके लिए रोजगार के वैकल्पिक साधन जुटाने में कर सकते हैं | आम जनता,सरकार, कानून, पुलिस और प्रशासन की मदद से ऐसे प्रयत्न अवश्य होने चाहिए जिससे कि चकलाघर के वासियों का अपना घर हो, इन्हें अर्थोपार्जन के सम्मानित अवसर मिलें और लज्जा-घृणा मिश्रित घुटन भरे वातावरण से ये सदा-सदा के लिए मुक्त हो जाएँ | ही मिट जाए | सच्चाई की ठोस धरती पर चकलाघर जैसी अमानुषिक संस्थाओं का अस्तित्व मिटना चाहिए |
सामान्यतः देखा जाता है कि चकलाघरों पर रेड पड़ने के परिणामस्वरूप पीड़ितों को ही और पीड़ा भोगनी होती है जबकि क़ानूनी शिकंजे तो उन सफेद कालर वाले मालिकों, संचालकों और ग्राहकों पर भी कसना चाहिए  जिनके कारण एक स्त्री एक ही जीवन में अनगिनत बार मृत्युसदृश पीड़ा का आलिंगन करती है | इस देह व्यापार के अंत से हाशिए पर खड़ी उपेक्षित स्त्री समूह को पूर्ण मनुष्य होने का अहसास मिलेगा | इनके लिए उपलब्ध कराए गए वैकल्पिक रोजगार के साधन एवं शिक्षा व्यवस्था स्त्री अस्मिता और अस्तित्व की स्थापना में सहायक ही होंगे | ‘तिनका तिनके पास’ उपन्यास की मुन्नी बेगम का म्युनिसिपल कमीशनर चुना जाना इसी व्यवस्था का परिणाम है | यौनकर्मी को देह व्यापार का लाइसेंस दे देना इस समस्या को पोषित करते रहने जैसा है | वृद्धावस्था में जब वे इस व्यापार के लिए अनुपयुक्त हो जाएँगी तब उनका जीवन-यापन कैसे होगा ? मनुष्य को मनुष्य का दर्जा मिलना ही मनुष्यता के हक में है अन्यथा समाज में उत्पन्न विसंगतियों का तोड़ निकालना मुश्किल होगा | “सोचा है क्या किसी ने कि आम्रपाली को बुद्ध ही क्यों अच्छे लगे थे ? क्यों लगे थे अच्छे मेरी मेक्डेलिन को ईसा मसीह |”11 रूप और गुण का संघात हैं स्त्रियाँ जिन्हें कोई विरला ही सही-सही समझ पाता है और वही उनकी आत्मा को छू सकने वाला ही उन्हें भाता है जो मनुष्य को मनुष्य मानता है |

संदर्भ : 

1.       अनामिका, 2008, तिनका तिनके पास, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 176
2.       खेतान, प्रभा. 2007, बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ.128
3.       वही, पृ.120-121
4.        अनामिका, 2008, तिनका तिनके पास, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 179
5.       वही, पृ. 63
6.        मिश्र, प्रभात कुमार,  2008, विद्यापति के काव्य में मिथिला का जनसमाज, समकालीन भारतीय साहित्य, मई-जून पृ.45
7.       संवाददाता, जागरण. 17-03-2017, 80 दिनों बाद अगवा छात्रा बरामद, तीन को जेल. अंक 330, दैनिक जागरण, पटना, पृ.6
8.        अनामिका, 2008, तिनका तिनके पास, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 95
9.       वही,. 244
10.     यादव, राजेंद्र. और अर्चना  वर्मा, 2002, औरत : उत्तर कथा, दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, पृ.154
11.     अनामिका, 2008, तिनका तिनके पास, दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. 287
                                


मैत्रेयी पुष्पा के साहित्य में स्त्री विमर्श