आर्मापुर पी.जी. कॉलेज (कानपुर) में द्विदिवसीय
राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
आर्मापुर पी.जी.कॉलेज,
कानपुर एवं भारत उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में 27-28 जनवरी, 2018 को ‘भारतीय भाषाओँ का समन्वय : सम्भावना
और विकल्प’ विषयक द्विदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन आर्मापुर पी.जी
कॉलेज में किया गया | समारोह के
उद्घाटन सत्र में महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. गायत्री
सिंह ने अतिथियों का स्वागत व अभिनंदन करते हुए अपने स्वागत भाषण में संगोष्ठी के
उद्देश्य पर प्रकाश डाला| उन्होंने कहा कि हमारे देश की विभिन्न
भाषाओं के मध्य एकता हेतु अद्यतन किए गए प्रयासों के प्रदेय की समीक्षा करना एवं
नवीन संभावनाओं पर विचार करना ही इस संगोष्ठी का उद्देश्य है| वर्तमान
समय में सोशल मीडिया संचार के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर
रहा है| यह हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के नए स्वरूप को हमारे समक्ष
प्रस्तुत कर रहा है|
सुप्रसिद्ध
भाषाविद डॉ. अरुणिमा कुमार ने विषय प्रवर्तक के रूप में दिए गए अपने वक्तव्य
में स्पष्ट किया कि भाषाओं के समन्वय में राष्ट्र के सर्वांग विकास का सूत्र निहित
है| डॉ. अरुणिमा ने कहा, “भारत को
भाषा ही जोड़ती है| भाषा का मूलमंत्र है –
अनेकता में एकता के सूत्र को खोजना| वैश्विक भावों में आदान-प्रदान
की जो समष्टि है, वह भाषा है| समस्त
भारतीय भाषाएं 18 भागों में विभाजित हैं| पुनः
भारोपीय भाषा परिवार को दो भागों में बाँटा गया, जिसके एक वर्ग ‘शतम्’ के
अंतर्गत उड़िया, कश्मीरी, सिन्धी जैसी भाषाएँ आतीं हैं| भारत
की प्राचीनतम भाषा वैदिक संस्कृत है जो सभी भाषाओं की जननी है| अतः
भाषाओं के मध्य समन्वय तो इनके डी.एन.ए. में
ही अंतर्गुम्फित है| संविधान में कुल 22 भाषाएँ स्वीकृत की गई हैं| इनमें से केवल हिंदी भाषा की व्यापकता
10 प्रांतों में है| देश एक है
और इसकी आत्मा भी एक ही है|”
मुख्य अतिथि
के रूप में सभा को संबोधित करते हुए आयुध निर्माणी के वरिष्ठ
महाप्रबंधक एवं प्रबंध समिति के अध्यक्ष श्री अरुण कुमार जैन ने कहा कि भाषा
अवश्य अभिव्यक्ति का माध्यम है परंतु इसके जरिए भी हमारा मुख्य उद्देश्य
मानवोत्थान ही होना चाहिए| भाषा समन्वय के संदर्भ में अपने
व्यावहारिक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि भिन्न–भिन्न भाषाओं को सीखने में लगने वाली सारी ऊर्जा को यदि हम निष्ठा और ईमानदारी से
सीखी हुई उस एक भाषा के प्रति समर्पित कर दें तो उस भाषा में बहुत काम हो सकता है| साथ
ही विभिन्न भाषाओं की शब्द संपदा से भाषा को समृद्ध बनाना भी हमारा ध्येय होना
चाहिए| कई भाषाओं के लिए एक ही लिपि का प्रयोग हो| भाषा का
सरल से सरल प्रयोग किया जाय| व्यक्ति के क्रियाकलापों (रोना, हँसना) में
भी भाव के रूप में सांकेतिक भाषा निहित है|
विशिष्ट
अतिथिद्वय श्री जुगनू गुप्ता (अपर महाप्रबंधक आयुध निर्माणी, कानपुर) एवं
श्री एच.आर.दीक्षित (महाप्रबंधक
लघु शस्त्र निर्माणी, कानपुर) ने क्रमशः
अपने विचार रखे | “हिंदी तोड़ने वाली नहीं, जोड़ने
वाली भाषा है” राष्ट्रकवि दिनकर के इस कथन की याद दिलाते हुए श्री गुप्ता ने कहा
कि भाषा देश को एकता के सूत्र में बाँधती है| इसमें
हिंदी अग्रणी भूमिका में है| हिंदी के प्रचार-प्रसार में
अहिन्दी भाषी लोगों का अहम भूमिका निभाना पूरे देश के लिए एक सुखद अहसास है| चर्चा
को आगे बढ़ाते हुए श्री दीक्षित ने विभिन्न प्रांतीय भाषाओं को एक मंच पर लाने की
बात की साथ ही यह चिंता भी व्यक्त की कि सोशल मीडिया और इंटरनेट से साहित्य
क्षतिग्रस्त हो रहा है| इस द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का
बिंदुवार प्रकल्प तैयार कर उसे श्वेत पत्र / डॉक्यूमेंट के रूप में प्रकाशित करने, संस्कृत भाषा
की पुस्तकों का विविध भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने तथा भाषाई समन्वय की दृढ़ता के
मद्देनजर त्रिभाषा फ़ॉर्मूला को लागू करने का सुझाव श्री दीक्षित ने दिया| भाषाई
समन्वय में अनुवाद की महत्ता को रेखांकित करते हुए
उन्होंने कहा कि प्रो.मैक्समूलर का संस्कृत से अंग्रेजी में
किया गया कार्य और दाराशिकोह का फारसी भाषा में उपनिषद्, गीता, रामायण
इत्यादि का अनुवाद हमारे आत्मगौरव को जगाने वाला है | “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल”– भाषा के
संबंध में भारतेंदु की यह पंक्ति एक
मार्गदर्शक की भांति है|
उद्घाटन
सत्र के अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए श्री शैलेन्द्रनाथ (महाप्रबन्धक, फील्ड
गन फैक्ट्री) ने कहा कि आज का यह भाषाई विषय वासन्ती विविधा सहित कई दुविधाओं
से भरा हुआ है| संविधान की धारा 350ए में निहित भाषा संबंधी विविधता और विरोधाभास, जिससे भाषाई समस्या ने जन्म लिया है, उसी
संदर्भ में हमें एक अल्पतम कमीशन बनाना पड़ा जिसका केंद्रीय कार्यालय इलाहाबाद में
है| अभिप्राय यह है कि भाषाओं के विकास के लिए किए गए हमारे संकल्प आज
भी अधूरे हैं| 1956 में भाषा के आधार पर आंध्रप्रदेश का जन्म हुआ
जो आज पुनः तेलंगाना राज्य बनाकर दो भागों में विभक्त है| 1973 में
भाषा के आधार पर ही बांग्लादेश बना| यह सारे उदाहरण भाषा की ताकत को बताते
हैं| भाषाओं की गरिमा इसी में है कि प्रत्येक भाषा एक दूसरे के शब्दों
को उदारता से ग्रहण करे, समृद्ध बने और अपने अस्तित्व की
व्यापकता का प्रसार करें| समाहार करते हुए उन्होंने कहा कि ‘पुराना
ही सबकुछ अच्छा है’ यह भाव ठीक नहीं है| भाषा
के विषय में उदारतापूर्वक नित नए प्रयोगों से अधिकाधिक भाषाओं को सीखने-समझने
की प्रवृति हममें होनी चाहिए| यही भाषा के प्रति हमारा सच्चा समर्पण
होगा |
इस सत्र में
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रबंध समिति के सचिव श्री एम.के.मौर्य
ने कहा कि भाषाएँ अपना समन्वय स्वयं करती हैं, कोई और
इनका समन्वय नहीं कर सकता है | कोई भी भाषा दीर्घकाल तक पवित्र गंगा
की धारा की तरह चलते हुए विभिन्न भाषाओं को आत्मसात करती है, अपने में
ढालती है; यही उसकी शक्ति है और इसी शक्ति से वह पूरे देश को सींचती और
संभालती है|
इसके
पश्चात् प्रथम दिवस (27 जनवरी) दो
वैचारिक सत्र संपन्न हुए जिनमें वक्ताओं ने शोधपत्र प्रस्तुत किया| प्रथम
वैचारिक सत्र का विषय प्रवर्तन करते हुए राजकीय महिला महाविद्यालय के संस्कृत
विभाग की अध्यक्ष डॉ. रचना शर्मा ने भाषा को जन संवाद की
जननी कहा और देश की एकता और अखंडता के लिए भाषाओं के मध्य समन्वय को आवश्यक बताया | विशिष्ट
अतिथि के रूप में इलाहबाद से पधारे सुप्रसिद्ध उर्दू लेखक डॉ. आरिफ
मोहम्मद ने भाषाई सहजता पर बल देते हुए कहा कि हिंदी या अन्य भाषाओं के शब्दों का
हिन्दीकरण या अन्य भाषाईकरण न करके उन्हें सहज रूप से अपनाना ही श्रेयष्कर है|
डॉ. कुसुम सिंह (प्रो., महात्मा
गाँधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट) ने मुख्य वक्ता के रूप में दिए गए
अपने उद्बोधन में कहा कि गाँव-कस्बे से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक
साहित्य और व्यापार का आधार हिंदी को बनाना होगा | विविध
भाषाओं का उदाहरण देते हुए उन्होंने समन्वयिता से उद्भूत होते और प्रसार पाते
अपनत्व की ओर श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट किया| सत्राध्य्क्ष
प्रो.इसरार गाँधी (वरिष्ठ उर्दू-हिंदी
साहित्यकार) ने अपने अध्यक्षयीय वक्तव्य
में हिंदी और उर्दू को पानी में मिले हुए शक्कर से बने शरबत की तरह बताते हुए
स्पष्ट किया कि दोनों भाषाओँ में फर्क महज लिपि का है| इस सत्र
में डॉ. महलका एजाज ने धन्यवाद ज्ञापन किया|
भोजनावकाश
के पश्चात् आरंभ हुए द्वितीय वैचारिक सत्र में श्री स्वामी शरण के संरक्षण में
प्रकाशित भारतीय संस्कृति को जीवित रखनेवाले वैदिक साहित्य का लोकार्पण किया गया| इस
सत्र में डॉ. उमेश पालीवाल, श्री के.के.जिंदल
एवं डॉ.विपिन पाण्डेय विशिष्ट अतिथि
तथा श्री सुजीत कुंतल मुख्य वक्ता के रूप में सम्मिलित हुए| इस सत्र
के माननीय मुख्य अतिथि श्री हृदयनारायण दीक्षित (अध्यक्ष, उत्तरप्रदेश
विधानसभा) अपरिहार्य कारणवश नहीं आ सके तो उन्होंने फैक्स के माध्यम से अपना
शुभकामना संदेश प्रेषित किया| मुख्य अतिथि पद्मश्री श्री गिरिराज
किशोर ने अपने संबोधन में हिंदी सहित सभी भाषाओं पर मंडराते हुए खतरे की ओर इशारा
किया | श्री आदित्य झा (पत्रकार, दैनिक
जागरण, भोपाल) एवं गोपाल सिंह, अनिल
कुमार (शोध छात्र, डोगरी भाषा) ने शोध
पत्र प्रस्तुत किया| नगर के गणमान्य व्यक्तियों का सारस्वत
अभिनन्दन इस अवसर पर किया गया | उत्तरप्रदेश भाषा संस्थान के
कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राजनारायण शुक्ल ने सत्राध्यक्ष की
भूमिका में भाषाई समन्वय पर गंभीर चिंतन करते हुए उ०प्र०भा० संस्थान को अनुवाद के
साथ-साथ सम्मलेनों, कार्यशालाओं और संगोष्ठियों के आयोजन
के लिए कृत संकल्पित कहकर भाषा के प्रति अपनी और भाषा संस्थान की प्रतिबद्धता जाहिर की| धन्यवाद
ज्ञापन डॉ.राधा शाक्य ने किया |
दिनांक 28-01-2018 को आरंभ हुए तृतीय वैचारिक सत्र में डॉ. आलोक
कुमार (विभागाध्यक्ष, शिक्षा शास्त्र, आर्मापुर
पी.जी कॉलेज) ने अपने स्वागत भाषण द्वारा अतिथियों
का स्वागत व अभिनंदन किया| मुख्य अतिथि डॉ. ऋतंभरा (अध्यक्ष, हिंदी
विभाग, ए.एन.डी कॉलेज, कानपुर) ने
कहा, “हिंदी उदार भाषा है और वह सभी भाषाओं को
आत्मसात करने के लिए तत्पर रहती है | नई पीढ़ी द्वारा इस दिशा में कार्य
किया जाना निश्चित ही सराहनीय है|” मुख्य वक्ता डॉ. प्रमिला
सिंह (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, विद्या
मंदिर महिला पी जी कॉलेज,कानपुर) ने कहा, “आर्य और द्रविड़ भाषा जननी भाषाएँ हैं| इनसे ही
सारी भाषाएँ निकली हैं| दक्षिण में बोली जानेवाली आर्यभाषाओं
का जन्म होना, सिन्धु घाटी सभ्यता काल में प्रारंभ हुआ| हिंदी
भाषा दक्षिण की चारों भाषाओं से समन्वय कर रही है | बस
क्षेत्र और उच्चारण के हिसाब से बोलियाँ बदलती रहती हैं|” बंगला
साहित्यविद डॉ.वारेन सरकार ने कहा कि यदि आप अपने आप को शिक्षित समझते हैं तो
तीन भाषाओँ – ‘मातृभाषा, राष्ट्रभाषा
और अंतरराष्ट्रीय भाषा’ को जानना जरुरी है|
डॉ डी.पी.मिश्रा ने कहा कि अंग्रेजी भाषा को लोग दिल से जोड़कर रखते हैं; भाषाई समन्वय के हित में उसे उतार फेंकने की जरुरत है|
डॉ. अनिल तिवारी ने डोंगरी भाषा की दशा-दिशा और
संघर्ष पर चर्चा की| इसी चर्चा पर आधारित शोध पत्र जम्मू
कश्मीर से आए दो शोध छात्रों (अनिल कुमार, गोपाल
कुमार ) ने भी प्रस्तुत किया|
चतुर्थ
वैचारिक सत्र में मुख्य अतिथि डॉ.विद्याबिंदु सिंह (लखनऊ)
ने कहा, “परिवर्तनशील भाषा ही जीवित रहती है| जो
भाषा गतिशील नहीं होती है वह मृत हो जाती है| कोई भी
भाषा अपनी संस्कृति से ही समृद्ध होता है| अनुवाद और सांस्कृतिक परिवेश की अहम
भूमिका भाषा के विकास में नजर आती है|” इस सत्र की मुख्य वक्ता क्षमा
द्विवेदी ने कहा, “भाषा समन्वय के लिए शब्दों पर काम
होना चाहिए|” प्रो.योगेन्द्र प्रताप सिंह (लखनऊ)
ने अपने वक्तव्य में कहा, “भारतीय भाषाओं का समन्वय भारतीय
भाषाओं के साहित्य विशेषकर संतों-भक्तों और मानवतावादी साहित्य के
संपोषण एवं प्रसार से संभव है| अनुवाद, तुलनात्मक
अध्ययन एवं एक्य की भावना को पुष्ट करनेवाले प्रकल्प इस कार्य में सहायक सिद्ध हो
सकते हैं| जिस प्रकार मध्ययुगीन साहित्य के चरित नायक राम-कृष्ण
प्रत्येक भाषाओं में हैं उसी प्रकार वर्तमान में स्वाधीन चेतना का विमर्शमूलक
मानवतावादी साहित्य हर भाषा में उपलब्ध है|” ‘मणिप्रवालम’ का उदाहरण
देते हुए उन्होंने कहा कि विविध भाषा परिवारों की भाषाओं के मध्य एक्य इन्हीं
सूत्रों से स्थापित होगा| प्रो. सूरज
बहादुर थापा (लखनऊ) ने कहा, “समन्वय
एकतरफा नहीं होता है| यह दोनों ओर से होना चाहिए | हिंदीतर
भाषियों को हिंदी और हिंदी भाषियों को कम से कम एक दूसरी भाषा सीखनी चाहिए| भारतीय
साहित्य की अवधारणा से ही भारतीय भाषाओं का समन्वय हो पाएगा| इसके लिए
भक्ति आन्दोलनकालीन लोकधर्मी सांस्कृतिक चेतना का अखिल भारतीय स्तर पर उन्नयन करना
होगा |” डॉ. नृपेन्द्र सिन्हा (हेवरा) ने
भाषा के समाजशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला| डॉ. अनामिका
सिंह (बाराबंकी) ने असमिया और हिंदी भाषा के
समन्वयात्मक स्वरूप पर प्रकाश डाला| धन्यवाद ज्ञापन डॉ. निशि
द्विवेदी ने किया |
अंत में
समापन सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता श्री शिवकुमार
सिंह ‘कुंवर’ ने की| डॉ. राधा
शाक्य, डॉ. कुसुम सिंह, डॉ. आशा
सिंह, डॉ. माहे तलत सिद्दीकी, सुहानी
यादव, डॉ. रेखा श्रीवास्तव, डॉ. क्षमा
द्विवेदी, श्री महिपाल सिंह, आजाद कानपुरी, डॉ. सुषमा
त्रिपाठी, डॉ. चन्दन कुमारी, श्री मोहन
सिंह कुशवाहा, डॉ. सफलता सरोज तथा अन्य कवियों ने काव्य
पाठ किया| महाविद्यालय के कार्यक्रमों में अपनी सहभागिता देनेवाले तथा
दत्तचित्त होकर अपना कार्य संपादन करनेवाले सभी कर्मचारियों को प्राचार्या महोदया
ने सम्मानित किया| सभी विशिष्ट अतिथियों द्वारा
प्राचार्या डॉ.गायत्री सिंह को भावपूर्ण और गरिमामय सम्मान से नवाजा गया| संगोष्ठी
के विविध सत्रों का संचालन डॉ.गरिमा जैन, सुश्री
रंजना यादव, डॉ. बबिता सिंह और डॉ.नीरज
कुमार सिंह ने किया | इस महाविद्यालय की उपलब्धि यह भी रही
कि यहाँ के एक छात्र की कृति का लोकार्पण इस द्विदिवसीय संगोष्ठी के दौरान
किया गया| (प्रस्तुति
: डॉ. चंदन कुमारी)
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