अभिनंदन पत्र
माननीय हृदयनारायण दीक्षित
उत्तरप्रदेश विधान सभा अध्यक्ष (निर्विरोध
निर्वाचित)
अभिनंदन
उन्नाव के सपूत
“होनहार बिरवान के होत चिकने पात” के प्रतिरूप
श्री हृदयनारायण दीक्षित का जन्म वर्ष 1946 में उन्नाव जिले के पुरवा तहसील के
लउवा गाँव में हुआ| इनके पिता का नाम स्व० अंबिका प्रसाद दीक्षित है| इन्होंने
कानपुर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए की उपाधि ली है| 5 जुलाई, वर्ष
1960 को इनका शुभ विवाह श्रीमती माधुरी दीक्षित के साथ संपन्न हुआ| इनके तीन
पुत्र एवं दो पुत्रियाँ हैं| इन्होंने अपने आरंभिक व्यवसाय के रूप में कृषि और
पत्रकारिता का चयन किया| इनकी अभिरुचि जनसेवा, पत्रकारिता, अध्ययन और लेखन के साथ
शोध कार्य में भी रही है|
कबीर परंपरा के संवाहक
“कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ |
जो घर
फूंके आपनौ , चले हमारे साथ ||”
आपातकाल के दौरान श्री हृदयनारायण दीक्षित लगभग
डेढ़ वर्ष तक जेल में रहे| वर्ग भेद और जाति भेद को मिटाने के उद्देश्य से इन्होने
समता आंदोलन की संस्थापना वर्ष 1968 में की| यह आंदोलन 1980 तक सक्रिय रहा| समाज
की तमाम जड़ताओं पर प्रहार करते हुए ये निरंतर सामाजिक उत्थान हेतु निःस्वार्थ भाव
से कृत संकल्पित हैं| इन्हें “उन्नाव का कबीर”
भी कहा जाता है|
भारतीय संस्कृति के
पुरोधा
“अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम |
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम् ||”
अर्थात् अठारह पुराण में महर्षि व्यास ने दो ही
वचन कहे हैं – परोपकार पुण्य है और परपीड़ा पाप है| महर्षि व्यास के इन वचनों को
अपनी जीवन पद्धति की कुंजी बनाकर ये भारतीय संस्कृति की साधना में रत होकर
अक्षुण्ण और प्रगतिशील भारतीय परंपराओं का निरंतर संरक्षण कर रहे हैं| धर्म और
दर्शन के ज्ञाता और व्याख्याता के रूप में भी इनकी प्रसिद्धि है|
माँ सरस्वती के वरद
पुत्र
श्री हृदयनारायण दीक्षित प्रतिष्ठित साहित्यकार,
और संवेदनशील कवि भी हैं| इन्होने वर्ष 1978 में ‘काल चिंतन’ साप्ताहिक पत्रिका का
शुभारंभ अपने योग्य दिशा – निर्देशन में किया| पत्रिका के मुख्य संपादक के रूप में
वे वर्ष 2000 तक इसका कुशल संपादन और प्रकाशन करते रहे| राष्ट्रीय समाचार पत्रों
एवं पत्रिकाओं में इनके 5000 से अधिक लेख छप चुके हैं| इनके द्वारा लिखे गए स्तंभ
सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करनेवाले होते हैं|
इन्होंने लगभग 40 पुस्तकें लिखीं हैं जिनमें से
कुछ मुख्य पुस्तकें हैं – जागृत जनता, यह व्यवस्था बेईमान है (भाषण संग्रह),
भारतीय संस्कृति की भूमिका, सांस्कृतिक राष्ट्र दर्शन, पंडित दीनदयाल उपाध्याय
दर्शन, सांस्कृतिक अनुभूति : राजनैतिक प्रतीति, भारतीय समाज-राजनैतिक संक्रमण,
ऋग्वेद और डॉ. रामविलास शर्मा, जम्बू द्वीपे भरतखंडे, राष्ट्रायस्वाहा, श्रीराम
आस्था व इतिहास, ॐ शिव देवाधिदेव महादेव, ईशावास्योपनिषद् का पुनर्गठन, इत्यादि|
मुखर, संघर्षशील, जुझारू
और यशस्वी राजनेता
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री हृदय
नारायण दीक्षित, समय – समय पर अपने प्रबुद्ध लेखन से जहाँ सामाजिक विसंगतियों को
सुलझाने की चेष्टा करते रहे हैं वहीँ राजनीति के मैदान में भी इनका कोई सानी नहीं
है| 30-03-2017 को इन्हें उत्तर प्रदेश की 17वीं विधान सभा का अध्यक्ष निर्विरोध
चुना गया| ये वर्ष 1964 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए| वर्ष 1973
में भाजपा जिला परिषद उन्नाव के सदस्य बने| वर्ष 1980 में भाजपा उन्नाव के
जिलाध्य्क्ष बने| ये भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष और प्रमुख प्रवक्ता की भी
जिम्मेदारी निभा चुके हैं|
वर्ष 1985 में इन्होंने पहली बार निर्दलीय रूप से
विधान सभा का चुनाव लड़ा और विजयी रहे|
इन्होने वर्ष 1989, 1991, 1993 में क्रमशः जनता दल, जनता पार्टी, सपा के
उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता है| वर्ष 1995 में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार में
इन्होंने संसदीय कार्य एवं पंचायती राजमंत्री की भूमिका का निर्वाह किया है| वर्ष
2010 से जून 2016 तक इन्होने भाजपा विधान परिषद सदस्य और दलनेता की भूमिका का
बखूबी निर्वाह किया| संगठन में इनकी पकड़ मजबूत है और इनके योग्य नेतृत्व में
संगठन का भी भविष्य उज्ज्वल है|
कर्मयोगी
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगो स्त्वकर्मणि ||2-47||
अर्थात् मनुष्य का अधिकार सिर्फ कर्म करने में
है, फल में उसकी प्रतीति कभी नहीं होनी चाहिए| ईश्वर मनुष्य के कर्म के अनुसार
उसके लिए कर्मफल का विधान करता है| गीता के इस निष्काम कर्म भावना को इन्होंने
अपने आचरण में उतारा है|
दक्ष शैक्षिक
प्रबंधक
इन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय इंटर कॉलेज की
स्थापना की| उक्त कॉलेज के सफल प्रबंधन के साथ ही इन्होंने भारतीय आदर्श एंग्लो
संस्कृत इंटर कॉलेज एवं बी० ए० एस० इंटर कॉलेज, पुरवा, उन्नाव में भी इनकी प्रबंधन
दक्षता से शिक्षण स्तर सुधरा जो सामाजिक उत्थान के हित हेतु आवश्यक है|
कुशल प्रशासक एवं
निर्भीक पत्रकार
वर्ष 1977 से 1978 तक उत्तर प्रदेश शासन के
अंतर्गत ये जेल विजिटर के पद पर रहे| इनकी पत्रकारिता के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने
इन्हें सम्मानित भी किया |
प्रजातांत्रिक परंपरा
के पक्षधर
संगठन में भी इन्होंने छोटे-बड़े सभी सदस्यों की
सहमति-असहमति और जिज्ञासा का सदैव ख्याल रखा है| सदस्यों की बातों को समझते हुए ,
परिस्थिति की गंभीरता का जायजा लेते हुए इन्होने अपने बौद्धिक, अपनत्व भरे और
संवेदनशील रुख से सदस्यों की असहमति को सदैव सहमति में परिणत किया है|
एकात्म मानववाद के
अनुयायी
“अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम|
उदारचितानां तु वसुधैव कुटुंबकम ||”
अर्थात् यह मेरा है, यह उसका है; ऐसी सोच संकुचित
चित्त वाले व्यक्तियों की होती है| उदारमना लोगों को यह सारी धरती ही अपना परिवार
लगती है | इसे आत्मसात करते हुए ये पंडित दीनदयाल के “एकात्म मानववाद” की
विचारधारा को निरंतर प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं| इन्होंने एक सशक्त और स्वस्थ
समाज के निर्माण हेतु सुदृढ़ शैक्षिक संरचना और महिला - सशक्तता को मूलभूत आवश्यकता
माना है|
विशिष्ट उपलब्धियाँ
इनको मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा ‘गणेश शंकर
विद्यार्थी सम्मान’ , भानु प्रताप शुक्ल पत्रकारिता सम्मान तथा राजस्थान के छोटी
खाटू पुस्तकालय द्वारा ‘दीनदयाल उपाध्याय सम्मान’ से सम्मानित किया गया है|
आज दिनांक 27-01-2018 को आर्मापुर पी जी कॉलेज और
भारत उत्थान न्यास के तत्वावधान में आयोजित “भारतीय भाषाओँ का समन्वय : संभावना और
विकल्प” विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर श्री हृदयनारायण दीक्षित का
अभिनंदन करते हुए हम अपार हर्ष का अनुभव कर रहे हैं|
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें